बिहार की सियासत में भरत तिवारी एनकाउंटर बना टर्निंग पॉइंट, तेजस्वी यादव के लिए सत्ता का नया रास्ता? बिहार एक घंटा पहले 3
भोजपुर में भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर के बाद उपजे जनाक्रोश ने तेजस्वी यादव को अपनी समावेशी राजनीति को विस्तार देने का एक बड़ा मौका दिया है। यह घटना अब कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

भरत तिवारी मामला और तेजस्वी की राजनीति

बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं और चार पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी हुई है, लेकिन विपक्ष इसे कानून-व्यवस्था और प्रशासन की विफलता के रूप में देख रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के लिए यह घटनाक्रम सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचने का एक बड़ा रणनीतिक अवसर बनता दिख रहा है।

सामाजिक समीकरण साधने का मौका

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी यादव के पास पहले से ही 30 से 32 प्रतिशत वोटों का मजबूत आधार मौजूद है। सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए उन्हें अतिरिक्त 5 से 10 प्रतिशत मतों की आवश्यकता है। भरत तिवारी का मुद्दा उन्हें उन सामाजिक वर्गों के बीच पैठ बनाने का मौका दे रहा है, जो पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय जनता दल से दूरी बनाए रखते हैं। यदि तेजस्वी इस मामले को केवल विरोध तक सीमित न रखकर न्याय और सुरक्षा के व्यापक मुद्दे के रूप में पेश करते हैं, तो वे अपनी A to Z समावेशी राजनीति को नई मजबूती दे सकते हैं।

सम्राट चौधरी सरकार के सामने चुनौतियां

यह मामला मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। सरकार के भीतर से ही जेडीयू अध्यक्ष संजय झा और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे जैसे नेताओं ने इस पर सवाल उठाए हैं। जातीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार राज्य में अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत और सामान्य वर्ग 15.52 प्रतिशत है। इसमें सवर्ण जातियों की हिस्सेदारी करीब 10.56 प्रतिशत है। इस घटना ने सवर्ण समाज में भी सरकार के प्रति असंतोष को हवा दी है।

क्या तेजस्वी सफल हो पाएंगे?

राष्ट्रीय जनता दल का एक प्रतिनिधिमंडल उदय नारायण चौधरी के नेतृत्व में पीड़ित परिवार से मिल चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेजस्वी यादव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इस मुद्दे को जातीय ध्रुवीकरण के बजाय नागरिक अधिकारों और सुशासन के सवाल के रूप में कितना स्थापित कर पाते हैं। यदि वे पीड़ित को न्याय दिलाने की मुहिम में आगे रहते हैं, तो इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिल सकता है। हालांकि, पूरी तरह जातीय विमर्श में सिमट जाने पर इसका असर सीमित भी हो सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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