बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बांकीपुर का चुनावी रण और सियासी अहमियत
बिहार की राजधानी पटना की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित विधानसभा सीटों में से एक बांकीपुर का परिणाम आज सामने आने वाला है। मतगणना के दौरान जैसे-जैसे राउंड पूरे हो रहे हैं, सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। यह उपचुनाव केवल एक सीट के नतीजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ की साख और प्रशांत किशोर के जन सुराज की राजनीतिक स्वीकार्यता की बड़ी परीक्षा बन गया है।
साल 1957 से जारी सियासी सफर
बांकीपुर सीट का इतिहास काफी पुराना है। साल 1957 से लेकर आज 2025 तक इस विधानसभा क्षेत्र ने बिहार की राजनीति में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। यहाँ का मतदाता कभी पुराने दिग्गजों को सिर आंखों पर बैठाता रहा है, तो कभी बड़े-बड़े रसूख वाले नेताओं को हार का स्वाद चखाया है। चुनावी आंकड़ों और जीत-हार के रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि यह क्षेत्र हमेशा से ही राज्य की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है।
भाजपा का गढ़ और चुनावी कसौटी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर में भाजपा पिछले करीब 30 वर्षों से अपना दबदबा बनाए हुए है। ऐसे में आज के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या पार्टी अपने इस वर्चस्व को बरकरार रख पाएगी या फिर नई राजनीतिक ताकतों के सामने उन्हें झुकना पड़ेगा। प्रशांत किशोर का जन सुराज जिस तरह से इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, उसने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है।
नतीजों की ओर टिकी निगाहें
ईवीएम खुलने के बाद से ही हर राउंड की गिनती के साथ प्रत्याशियों के समर्थक बेचैन हैं। स्थानीय जनता से लेकर राजनीतिक रणनीतिकार तक यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर बांकीपुर की जनता ने किस दल पर भरोसा जताया है। यह सीट न केवल पटना बल्कि पूरे बिहार के लिए एक लिटमस टेस्ट की तरह है, जिसके परिणाम आने वाले समय में राज्य की नई राजनीति की दिशा तय करेंगे।
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