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एक घंटा पहले
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मक्का में हुआ बड़ा रक्षा समझौता
मिडिल ईस्ट में तेजी से बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का में एक महत्वपूर्ण संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते को मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट का नाम दिया गया है। वैश्विक रणनीतिक जानकारों का मानना है कि क्षेत्रीय अस्थिरता के दौर में यह तीनों प्रमुख मुस्लिम देशों की ओर से अपनी एकजुटता दिखाने की एक बड़ी कोशिश है। इस समझौते के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और पड़ोसी देशों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इस संधि का वास्तविक असर क्या होगा।
क्या भारत-पाकिस्तान युद्ध में साथ देंगे तुर्की और सऊदी?
समझौते के ठीक बाद जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ का सामना एक टीवी एंकर के तीखे सवालों से हुआ, तो उनकी चुप्पी और असहजता साफ झलक रही थी। एंकर ने सीधे तौर पर पूछा कि यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच दोबारा कोई सैन्य संघर्ष या युद्ध की स्थिति पैदा होती है, तो क्या इस नए समझौते के तहत तुर्की और सऊदी अरब पाकिस्तान को सैन्य मदद देंगे या हथियार उपलब्ध कराएंगे?
इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया देने के बजाय टालमटोल करना ही उचित समझा। ख्वाजा आसिफ ने कहा कि समझौते पर आज ही हस्ताक्षर किए गए हैं और अभी इस स्तर पर इसके दस्तावेजों और बारीक विवरणों के बारे में बात करना उचित नहीं होगा। उनकी इस प्रतिक्रिया ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान वाकई इस समझौते से सैन्य सुरक्षा की वैसी गारंटी प्राप्त कर पाया है, जैसा वह दुनिया के सामने दिखाने की कोशिश कर रहा है।
नाटो मॉडल और समझौते की शर्तें
दूसरी ओर, तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इस समझौते की तुलना NATO चार्टर के आर्टिकल 5 से की है। उन्होंने दावा किया कि यह एक तकनीकी रूप से मजबूत सुरक्षा ढांचा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि यह समझौता किसी विशिष्ट देश या ईरान के खिलाफ नहीं है। उनका तर्क है कि जब तक किसी सदस्य देश पर हमला नहीं होता, तब तक यह संधि किसी के लिए भी आक्रामक नहीं है।
समझौते की शर्तों के मुताबिक, यदि इन तीन देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना और संभावित खतरों के खिलाफ एक ढाल तैयार करना है। लेकिन, विशेषज्ञों का मानना है कि संधि में अभी भी कई अस्पष्टताएं हैं। इसमें यह कहीं भी साफ नहीं लिखा है कि सैन्य हमला होने की स्थिति में अन्य दो देश किस तरह की सहायता करेंगे और क्या उन्हें सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होना होगा। तुर्की के उपराष्ट्रपति जेवडेट यिलमाज ने भी इसे पूरी तरह से एक रक्षात्मक कदम बताया है।
इस समझौते का रणनीतिक महत्व
यह समझौता केवल सैन्य दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक नजरिए से भी बेहद अहम है। इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
- तुर्की: तुर्की के पास वर्तमान में NATO देशों में दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, जो उसे एक ताकतवर खिलाड़ी बनाती है।
- सऊदी अरब: यह देश न केवल इस्लाम के पवित्र स्थलों का संरक्षक है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
- पाकिस्तान: यह विश्व का एकमात्र ऐसा मुस्लिम बहुल देश है जिसके पास परमाणु हथियार मौजूद हैं।
इन तीनों ताकतों का एक मंच पर आना भले ही बड़ी कूटनीतिक जीत की तरह पेश किया जा रहा हो, लेकिन ख्वाजा आसिफ के अनिश्चित जवाबों ने यह संकेत दे दिया है कि इस समझौते की धरातलीय हकीकत पर अभी भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। क्या यह संधि केवल कागजों तक सीमित रहेगी या वाकई संकट के समय काम आएगी, यह समय ही बताएगा।
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