बिश्केक डिक्लरेशन: सीमा पार आतंकवाद पर पाकिस्तान का रुख क्यों बदला, शहबाज शरीफ की खतरनाक रणनीति का विश्लेषण विश्व एक घंटा पहले 6
शंघाई सहयोग संगठन के बिश्केक शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के पीछे छिपी कूटनीतिक चालों का विश्लेषण।

बिश्केक डिक्लरेशन और बदलता वैश्विक समीकरण

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चला आ रहा तनावपूर्ण संबंध मुख्य रूप से सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर टिका है। भारत ने लंबे समय से इस्लामाबाद को इस बात के लिए घेरा है कि वह अपनी धरती का उपयोग भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए कर रहा है। हाल ही में संपन्न हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के बिश्केक शिखर सम्मेलन में एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में सवाल खड़े कर दिए हैं। इस सम्मेलन के संयुक्त घोषणापत्र में सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ साझा प्रतिबद्धता जताई है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस दस्तावेज़ में क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद की स्पष्ट निंदा की गई है और पाकिस्तान ने भी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

आतंकवाद और दोहरे मापदंडों पर अंतरराष्ट्रीय सहमति

घोषणापत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूपों की कड़ी निंदा की गई है और यह साफ तौर पर कहा गया है कि आतंकवाद के मामले में डबल स्टैंडर्ड या दोहरे मापदंड किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का हवाला देते हुए, सदस्य देशों ने इस बात पर जोर दिया है कि आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही को पूरी तरह रोकना होगा। वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति को लागू करना अब सभी सदस्य देशों की सामूहिक जिम्मेदारी है। यह भाषा उस मांग के अनुरूप है जिसे भारत वर्षों से वैश्विक मंचों पर उठाता रहा है।

पाकिस्तान का यू-टर्न या कोई नई साज़िश?

सवाल यह है कि जो पाकिस्तान खुद आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोपों से जूझ रहा है, उसने इस घोषणापत्र को स्वीकार क्यों किया? इसका उत्तर पाकिस्तान की अपनी आंतरिक सुरक्षा चिंताओं में निहित है। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में बढ़ रहे विद्रोह और सुरक्षा बलों पर हो रहे हमलों के लिए भारत पर आरोप मढ़ता आया है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत की खुफिया एजेंसियां बलूच विद्रोहियों को समर्थन देकर उसके देश में अस्थिरता पैदा कर रही हैं।

शहबाज शरीफ की खतरनाक चाल और एजेंडा

पाकिस्तान इस बहुपक्षीय मंच पर आतंकवाद के खिलाफ सख्त भाषा का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है। यह एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है। पाकिस्तान एक तरफ भारत पर सीमा पार आतंकवाद का आरोप लगाता है, तो दूसरी तरफ इसी शब्दावली का उपयोग करके बलूचिस्तान की आंतरिक समस्याओं को भारत प्रायोजित आतंकवाद के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। बिश्केक घोषणापत्र में शामिल 'क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद' और 'डबल स्टैंडर्ड' जैसे शब्दों का उपयोग पाकिस्तान अपने घरेलू संकट को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए करना चाहता है। वह यह संदेश देना चाहता है कि जो भारत उस पर आरोप लगाता है, वही काम वह स्वयं कर रहा है।

भारत का रुख और पाकिस्तान के दावे की हकीकत

भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि बलूचिस्तान में हो रही घटनाएं पाकिस्तान की अपनी विफल नीतियों, राजनीतिक दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन का परिणाम हैं। भारत कभी भी किसी अलगाववादी या आतंकवादी समूह का समर्थन नहीं करता। भारत की ओर से पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसी आतंकी घटनाओं का उदाहरण देकर पाकिस्तान को लगातार बेनकाब किया जाता रहा है। पाकिस्तान का एससीओ में भारत के साथ सहमति जताना किसी वैचारिक बदलाव का संकेत नहीं है, बल्कि यह उसकी एक कूटनीतिक मजबूरी है। वह चीन और रूस जैसे देशों के बीच अपनी जगह बचाए रखने के लिए आतंकवाद विरोधी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम किया जा सके।

क्षेत्रीय सुरक्षा और TTP का मुद्दा

पाकिस्तान के इस रवैये के पीछे एक और बड़ा कारण अफगानिस्तान और वहां से सक्रिय टीटीपी (TTP) संगठन है। खैबर पख्तूनख्वा में लगातार हो रही आतंकी वारदातों के लिए इस्लामाबाद अफगानिस्तान को जिम्मेदार ठहराता रहा है। इस घोषणापत्र के जरिए वह यह भी जताना चाहता है कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई जायज है। पाकिस्तान का उद्देश्य इस भाषा का उपयोग करके यह अंतरराष्ट्रीय वैधता हासिल करना है कि वह खुद भी आतंकवाद का पीड़ित है, ताकि वह टीटीपी के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहरा सके और भारत के खिलाफ अपनी पुरानी रणनीति को भी जिंदा रख सके।

भारत के लिए भविष्य की चुनौतियां

नई दिल्ली के लिए यह घोषणापत्र एक कूटनीतिक जीत है क्योंकि इसमें पहली बार सामूहिक तौर पर क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद और दोहरे मापदंडों की निंदा को मजबूती मिली है। भारत इस भाषा का इस्तेमाल पाकिस्तान को भविष्य में घेरने के लिए कर सकता है। हालांकि, भारत को सतर्क रहने की भी जरूरत है। पाकिस्तान इस दस्तावेज की आड़ में अपने प्रोपेगेंडा को और अधिक आक्रामक बना सकता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान की इस चालबाजी को समझे और बलूचिस्तान तथा पीओके के मुद्दे पर उसकी भ्रामक कहानियों को खारिज करे। बिश्केक डिक्लरेशन पाकिस्तान के लिए एक ढाल बनने की कोशिश है, लेकिन भारत की सतर्कता इसे उसकी कूटनीतिक हार में बदल सकती है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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