संयुक्त राष्ट्र में नए नक्शे पर भारत का समर्थन देख पाकिस्तान क्यों हुआ बेचैन, कश्मीर का राग फिर छेड़ा विश्व 2 घंटे पहले 4
संयुक्त राष्ट्र में पेश किए गए 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव का भारत ने समर्थन किया है, जिससे नक्शों की भौगोलिक विसंगतियां दूर होंगी। इस पर भारत के सख्त रुख और कूटनीतिक जीत से पाकिस्तान बौखला गया है और पुराने कश्मीर मुद्दे को हवा दे रहा है।

दुनिया के नक्शे पर छिड़ा महासंग्राम और भारत की कूटनीति

संयुक्त राष्ट्र में इन दिनों एक ऐसा प्रस्ताव चर्चा का केंद्र बना हुआ है जिसने वैश्विक स्तर पर नक्शों के प्रति नजरिया बदलने की तैयारी कर ली है। यह मामला 'करेक्ट द मैप' यानी नक्शे को सुधारने से जुड़ा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया है, जिससे दशकों से चली आ रही 'मर्केटर प्रोजेक्शन' की खामियां दूर होने की राह आसान हो गई है। लेकिन जैसे ही भारत ने अपना पक्ष रखा और विदेश मंत्रालय ने अपनी कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट की, पाकिस्तान में हड़कंप मच गया। बौखलाहट में पाकिस्तान ने महज 24 घंटे के भीतर अपना बयान जारी कर फिर से वही पुराना और घिसा-पिटा कश्मीर राग अलापना शुरू कर दिया है। यह सिर्फ एक नक्शे पर वोटिंग का मामला नहीं था, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती धमक और कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक का एक बेहतरीन उदाहरण बनकर सामने आया है।

क्या है 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव और क्यों पड़ी इसकी आवश्यकता?

हम बचपन से स्कूलों की किताबों और इंटरनेट पर जो दुनिया का नक्शा देखते आए हैं, उनमें एक बहुत बड़ी तकनीकी त्रुटि है। यह नक्शा मर्केटर प्रोजेक्शन नाम की पुरानी तकनीक पर आधारित है। यदि हम इस तकनीक का बारीकी से विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि इस नक्शे की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के पास स्थित देश अपनी वास्तविक स्थिति से कहीं ज्यादा विशाल नजर आते हैं। इसके विपरीत, भूमध्य रेखा के पास स्थित महाद्वीप अपने असली आकार की तुलना में काफी छोटे दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, नक्शे को देखने पर लगता है कि ग्रीनलैंड और अफ्रीका का आकार लगभग समान है, जबकि वास्तविक सच्चाई यह है कि अफ्रीका महाद्वीप ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है। दशकों से हम जिस नक्शे को सही मानते आ रहे हैं, वह दुनिया की सच्ची भौगोलिक तस्वीर पेश नहीं करता है। इसी भौगोलिक गलती को दूर करने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की पहल पर संयुक्त राष्ट्र में एक विशेष ड्राफ्ट पेश किया गया। इसे 'करेक्ट द मैप' नाम दिया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के सामने ऐसा नक्शा लाना है जो सभी देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक जमीनी क्षेत्रफल के अनुपात में दर्शाए। इससे अफ्रीका जैसे विकासशील क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सही प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

भारत का समर्थन और विदेश मंत्रालय की दो टूक चेतावनी

बीते 4 सितंबर को जब इस प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, तो भारत ने बिना किसी संकोच के इसके पक्ष में अपना वोट डाला। भारत का स्पष्ट मत था कि ग्लोबल साउथ और अफ्रीका के देशों को नक्शे पर उनका उचित स्थान और आकार मिलना चाहिए। हालांकि, भारत के वोट देते ही पाकिस्तान में यह गलतफहमी फैल गई कि शायद नक्शे के बदलाव से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की राजनीतिक स्थिति पर कोई असर पड़ेगा। पाकिस्तान की इस अनर्गल और भ्रामक सोच को जड़ से खत्म करने के लिए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को एक आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का यह वोट केवल एक भौगोलिक सिद्धांत के समर्थन में है जो महाद्वीपों के सही आकार को दर्शाने का पक्षधर है। रणधीर जायसवाल ने दुनिया को चेतावनी के लहजे में स्पष्ट किया कि इस संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का मतलब किसी भी राजनीतिक नक्शे, विशेष प्रोजेक्ट या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को मान्यता देना बिल्कुल नहीं है। उन्होंने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अटूट और अभिन्न हिस्से हैं और इस पर भारत का रुख पूरी तरह से स्पष्ट, अडिग और बिना किसी समझौते वाला है। भारत ने इस बयान के माध्यम से एक बार फिर पूरी दुनिया को संदेश दिया कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के मुद्दे पर रत्ती भर भी पीछे हटने वाला नहीं है।

पाकिस्तान की बौखलाहट: फिर वही पुराना और बेतुका राग

भारत के इस कड़े और स्पष्ट बयान के सामने आते ही पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में खलबली मच गई। सोमवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने एक उकसाने वाला बयान जारी किया। पाकिस्तान ने भारत के रुख को बेबुनियाद करार देते हुए दावा किया कि भारत के एकतरफा बयानों से जम्मू-कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पाकिस्तानी प्रवक्ता ने अपने वही रटे-रटाए भाषणों को दोहराते हुए कहा कि कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एजेंडे में सबसे पुराना अनसुलझा विवाद है। पाकिस्तान ने एक बार फिर वही बेतुकी मांग उठाई कि कश्मीर का फैसला संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह के जरिए होना चाहिए। पाकिस्तान की यह हताशा साफ जाहिर करती है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रणनीति से इस्लामाबाद के हुक्मरान कितने डरे हुए हैं। पाकिस्तान को यह डर सता रहा है कि जिस तरह से भारत हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सीमाओं को लेकर मुखर है, उससे कश्मीर के मुद्दे पर उसका अपना झूठा नैरेटिव पूरी तरह ध्वस्त हो रहा है।

वैश्विक वोटिंग का गणित: अमेरिका अलग-थलग, 164 देश साथ

संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली में जब इस प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, तो नक्शे में सुधार के इस विचार को जबरदस्त जनसमर्थन मिला। दुनिया के 164 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जिसमें भारत भी एक प्रमुख देश के रूप में शामिल रहा। इस वोटिंग का गणित वैश्विक राजनीति के लिहाज से काफी दिलचस्प साबित हुआ है। पक्ष में 164 देशों ने समर्थन जताया और माना कि विकासशील देशों को सही भौगोलिक स्थान मिलना चाहिए। वहीं, शक्तिशाली देश अमेरिका इस प्रस्ताव के खिलाफ अकेला खड़ा रहा। अमेरिका का तर्क था कि नक्शों का मानकीकरण करना वैज्ञानिक संस्थाओं का दायित्व है, न कि संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक असेंबली का। इसके अलावा यूक्रेन, सर्बिया, मोल्दोवा, जॉर्जिया, एस्टोनिया और लिथुआनिया जैसे 6 देशों ने इस पूरी वोटिंग प्रक्रिया से खुद को दूर रखा। इस मतदान पैटर्न से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत ने ग्लोबल साउथ और अफ्रीका के देशों की आवाज का मजबूती से समर्थन किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जिम्मेदार और प्रभावशाली नेता के रूप में भारत की साख और मजबूत हुई है।

पाकिस्तान क्यों है बैकफुट पर?

पूरे घटनाक्रम का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान की बौखलाहट की असल जड़ उसकी अपनी कूटनीतिक विफलता है। संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव पूरी तरह से तकनीकी और भौगोलिक प्रकृति का था, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बावजूद पाकिस्तान उन हर अवसरों से डरता है जहां भारत अपनी संप्रभुता का जिक्र करता है। भारत ने बड़ी चतुराई से तकनीकी प्रस्ताव का समर्थन किया और तुरंत यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक सीमाओं के मामले में भारत का स्टैंड बिल्कुल नहीं बदलने वाला। पाकिस्तान इस चाल को समझ ही नहीं सका और अकारण ही परेशान हो गया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया है। जहां 164 देश भारत के साथ खड़े दिखे, वहीं पाकिस्तान को कश्मीर के नाम पर दुनिया का कोई नया समर्थन नहीं मिला। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से भारत ने हर वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का पूर्ण आंतरिक मामला है। पाकिस्तान की जनमत संग्रह की पुरानी रट अब वैश्विक समुदाय के बीच कोई प्रभाव नहीं डालती। भारत ने इस रणनीति के जरिए एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तरफ अफ्रीका और विकासशील देशों का विश्वास जीता, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया है कि भारत की सीमाओं पर उसकी कोई भी कुटिल चाल काम नहीं आएगी।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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