ईरान से दोस्ती, सऊदी से रक्षा करार और अमेरिका से संतुलन, कैसे उलझ गए हैं असीम मुनीर? विश्व 2 घंटे पहले 7
पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख असीम मुनीर के सामने इस समय एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है, जहां उन्हें ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका के हितों के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। सीमा विवादों और रक्षा समझौतों के बीच इस्लामाबाद की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

पाकिस्तान के सामने त्रिकोणीय कूटनीतिक संकट

पश्चिम एशिया के अस्थिर माहौल में पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हकीकत में इस्लामाबाद खुद तीन तरफा कूटनीतिक चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है। एक तरफ ईरान के साथ बढ़ता अविश्वास, दूसरी तरफ सऊदी अरब के साथ प्रगाढ़ होता रक्षा गठबंधन और तीसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यावहारिक संबंधों की अनिवार्यता ने पाकिस्तानी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। फील्ड मार्शल असीम मुनीर की हालिया तेहरान यात्रा ने इन विरोधाभासों को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।

फील्ड मार्शल असीम मुनीर की तेहरान यात्रा

पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख असीम मुनीर ने 20 अक्टूबर को तेहरान का दौरा किया। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में मची उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान के कद को बढ़ाना और एक मध्यस्थ की भूमिका को पुख्ता करना था। हालांकि, यह यात्रा उस समय हुई जब दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर तनाव चरम पर था। तफ्तान और गबद-रिमदान सीमा चौकियों पर आवाजाही ठप होने के कारण व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, इस प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी रोक के चलते लगभग 2,000 ट्रक सीमा के दोनों ओर फंसे हुए थे, जिससे व्यापारियों में गहरी निराशा और अनिश्चितता का माहौल बन गया।

व्यापारिक बाधाएं और सुरक्षा का पेच

इस्लामाबाद का तर्क है कि सीमा पर आवाजाही रोकने का निर्णय तस्करी पर लगाम लगाने और सुरक्षा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए लिया गया है। दूसरी ओर, ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह एक अस्थायी तकनीकी व्यवधान था। हालांकि, हकीकत यह है कि जब असीम मुनीर ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की, तो चर्चा का प्रमुख केंद्र इन सीमा चौकियों को फिर से खोलना ही था। दोनों देशों के बीच जमीनी व्यापारिक मार्ग का आर्थिक महत्व बहुत अधिक है। ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण, समुद्री मार्गों के विकल्प के तौर पर इन रास्तों की अहमियत बढ़ गई है। पाकिस्तान द्वारा तीसरे देशों के सामान को ईरान तक भेजने की अनुमति को वापस लेना या उसमें रुकावट डालना यह दर्शाता है कि सुरक्षा और राजनीतिक दबाव किस कदर आर्थिक फैसलों को प्रभावित करते हैं।

प्रतिबंधों को लेकर पाकिस्तान की अस्पष्टता

रिपोर्ट में इस बात पर विशेष चिंता जताई गई है कि पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। मंत्रालय ने यह तो कहा कि इस्लामाबाद वैश्विक प्रतिबंध व्यवस्था का पालन करेगा, लेकिन यह कभी साफ नहीं किया कि किन विशिष्ट प्रतिबंधों का पालन किया जाएगा। इस तरह की अस्पष्ट नीति न केवल सीमा पार कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए वित्तीय जोखिम पैदा करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाती है।

सऊदी अरब के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग

इस्लामाबाद के लिए सऊदी अरब के साथ संबंधों का प्रबंधन सबसे जटिल चुनौतियों में से एक है। 5 अक्टूबर को पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग से जुड़ा एक नया समझौता सक्रिय हुआ। यह समझौता ऐसे समय में आया है जब यमन में हूती विद्रोहियों के हमले तेज हो गए हैं। असीम मुनीर की तेहरान यात्रा से ठीक एक दिन पहले, पाकिस्तानी सेना ने सऊदी अरब के राजदूत के साथ रणनीतिक समन्वय और रक्षा सहयोग पर विस्तार से चर्चा की। हालांकि, इस्लामाबाद लगातार यह सफाई दे रहा है कि उसके सैनिक सऊदी अरब में केवल रक्षात्मक भूमिका में हैं और वे यमन के किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेंगे, लेकिन ईरान के लिए पाकिस्तान और रियाद की यह बढ़ती निकटता चिंता का विषय है।

अमेरिका का प्रभाव और ईरान का रुख

इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान ने सीमा चौकियां बंद कीं? फिलहाल कोई ठोस प्रमाण ऐसा दावा नहीं करते, लेकिन ईरान का अमेरिका के प्रति सख्त रवैया पाकिस्तान के लिए और अधिक मुश्किलें पैदा कर रहा है। ईरानी सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रजाई ने साफ कर दिया है कि जब तक वाशिंगटन ईरान की शर्तें नहीं मानता, तब तक बातचीत की कोई संभावना नहीं है। तेहरान की प्रमुख मांगों में तेल निर्यात पर से प्रतिबंध हटाना और नाकेबंदी खत्म करना शामिल है। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से घरेलू नियंत्रण में रहेगा।

बलूचिस्तान और सुरक्षा की जमीनी हकीकत

ईरान और पाकिस्तान के संबंधों में बलूचिस्तान का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। जनवरी 2024 में दोनों देशों के बीच हुए जवाबी हमलों ने साबित कर दिया है कि सीमा पर सुरक्षा तनाव कितनी जल्दी सैन्य टकराव का रूप ले सकता है। दोनों देशों के सुरक्षा बलों को वहां सक्रिय विद्रोही समूहों और राष्ट्रवादियों का सामना करना पड़ता है। सीमा बंद होने का सीधा असर उन हजारों ट्रक चालकों और छोटे व्यापारियों पर पड़ता है, जो दिन-प्रतिदिन के व्यापार पर निर्भर हैं। खराब होती जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुएं और परिवहन लागत में हुई बढ़ोतरी ने सीमावर्ती क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है।

पाकिस्तान के सामने भविष्य की चुनौती

रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि असीम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान एक कठिन चौराहे पर खड़ा है। इस्लामाबाद को ईरान का भरोसा जीतना है, सऊदी अरब के साथ अपनी रणनीतिक साख बचानी है और अमेरिका के साथ संबंधों को टूटने से बचाना है। यह काम तभी संभव है जब पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति में पारदर्शिता और निरंतरता हो। केवल सीमा चौकियों को खोलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच खोया हुआ विश्वास बहाल करना अब एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गया है। पाकिस्तान की मध्यस्थ के रूप में भविष्य की राह उसके इन्हीं फैसलों से तय होगी कि वह अपनी कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं को व्यापारिक और रक्षा हितों के साथ कैसे जोड़ पाता है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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