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एक घंटा पहले
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पाकिस्तान के सत्ता के गलियारों में खलबली
पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे नाजुक और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। देश के भीतर पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आम जनता का गुस्सा उफान पर है और बलूचिस्तान पहले से ही बगावत की आग में जल रहा है। इन संकटों के बीच अब एक नया और बड़ा टकराव सामने आया है, जो सीधे तौर पर देश के सबसे ताकतवर सत्ता केंद्रों के बीच छिड़ा हुआ है। यह जंग अब दूरदराज के इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे सेना के गढ़ रावलपिंडी और इस्लामाबाद स्थित राष्ट्रपति भवन के बीच पहुंच चुकी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि पाकिस्तान में एक बार फिर तख्ता पलट की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
सेना और राष्ट्रपति के बीच 'खामोश जंग'
मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) के संस्थापक अल्ताफ हुसैन ने एक बेहद सनसनीखेज दावा करके पूरे मुल्क में हड़कंप मचा दिया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बीच पर्दे के पीछे एक खतरनाक 'खामोश जंग' जारी है। यह टकराव महज कुर्सी की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पाकिस्तान के संविधान में बड़े बदलावों और नए सूबे बनाने की जिद से है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गतिरोध जल्द खत्म नहीं हुआ, तो पाकिस्तान या तो मार्शल लॉ की चपेट में आ जाएगा या फिर एक बड़ी राजनीतिक तबाही का सामना करेगा।
पाकिस्तान की सियासत का इतिहास गवाह रहा है कि यहाँ की चुनी हुई सरकारें हमेशा फौजी जनरलों के इशारों पर नाचती रही हैं। हालांकि, इस बार रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय और राष्ट्रपति भवन के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है। अल्ताफ हुसैन ने अपने 462वें टिकटॉक वीडियो संदेश के जरिए यह जानकारी दी कि सेना और राष्ट्रपति जरदारी के आपसी रिश्ते इस वक्त अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। उनके अनुसार, पर्दे के पीछे ऐसा खेल रचा जा रहा है जो किसी भी क्षण नागरिक सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में सक्षम है। सेना का मुख्य उद्देश्य केवल सत्ता का नियंत्रण ही नहीं, बल्कि देश के नक्शे और संविधान को पूरी तरह से अपनी शर्तों पर बदलना है।
लंदन की गुप्त बैठक और जरदारी को मिला 'अंतिम संदेश'
अल्ताफ हुसैन ने इस गुप्त संघर्ष के कई पहलुओं को उजागर करते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आश्चर्य जताया कि जब पाकिस्तान की सीमाओं और संविधान में बड़े पैमाने पर बदलावों की साजिश चल रही है, तब देश के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हफ्तों से विदेश में क्यों डेरा जमाए हुए हैं। जरदारी पहले अपने बेटे बिलावल जरदारी के विवाह समारोह के लिए ऑस्ट्रिया गए थे, और उसके बाद से वे लगातार लंदन में मौजूद हैं।
अल्ताफ हुसैन के अनुसार, हाल ही में लंदन में पाकिस्तान के संघीय गृह मंत्री मोहसिन नकवी और राष्ट्रपति जरदारी के बीच एक बेहद गोपनीय मुलाकात हुई। यह कोई साधारण शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि लगभग एक घंटे तक चली एक गुप्त बैठक थी। इस बैठक में गृह मंत्री ने रावलपिंडी यानी सेना के टॉप ब्रास का एक बहुत ही कड़ा और अंतिम संदेश जरदारी तक पहुँचाया है। माना जा रहा है कि इसी सीक्रेट मैसेज के बाद से इस्लामाबाद और रावलपिंडी के बीच का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया है और टकराव चरम पर है।
नए सूबे का एजेंडा और मुहाजिरों को निशाना बनाने की साजिश
पाकिस्तान में इस समय नए प्रांत बनाने के मुद्दे पर भी भारी बहस छिड़ी हुई है। अल्ताफ हुसैन का आरोप है कि इस विचार को सबसे पहले गृह मंत्री मोहसिन नकवी और सेना के जनसंपर्क विभाग यानी DG ISPR द्वारा प्रायोजित किया गया था। सेना का मानना है कि यदि देश में प्रशासनिक दृष्टिकोण से नए सूबे बनाए जाते हैं, तो उन पर सेना का नियंत्रण कहीं अधिक प्रभावी होगा। हालांकि, इस पूरी योजना का दोष चालाकी से मुहाजिर समुदाय पर मढ़ा जा रहा है।
हुसैन ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) सिंध प्रांत में जानबूझकर नफरत और तनाव का माहौल तैयार कर रही है। उन्होंने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर से भी अपील की है कि वे मुहाजिरों की सुरक्षा को गंभीरता से लें और उनकी जायज मांगों को नजरअंदाज न करें। इसके अलावा, 28वें संविधान संशोधन की तैयारी भी इसी राजनीतिक बिसात का एक हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले 26वें और 27वें संशोधन के दौरान भी विभिन्न राजनीतिक दलों ने सौदेबाजी और गुप्त समझौतों का सहारा लिया था, जिसने देश को संवैधानिक संकट में धकेल दिया था।
मार्शल लॉ की आहट और गहराता राजनीतिक संकट
सेना और राष्ट्रपति जरदारी के बीच का यह संघर्ष देश को एक बड़े संवैधानिक दलदल में ले जा रहा है। अल्ताफ हुसैन ने साफ लहजे में चेतावनी दी है कि यदि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए समाधान नहीं निकला, तो पाकिस्तान में जो भी लोकतंत्र बचा है, वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। इस गतिरोध के परिणाम स्वरूप देश दो संभावित रास्तों पर खड़ा है। या तो देश में एक बार फिर प्रत्यक्ष फौजी शासन यानी मार्शल लॉ लागू किया जाए, अथवा राष्ट्रपति जरदारी और उनकी सरकार को हटाकर सत्ता किसी अंतरिम सरकार को सौंपी जाए।
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास का अनुभव यही कहता है कि जब भी रावलपिंडी के जनरलों और इस्लामाबाद के राजनेताओं के बीच ठनती है, तो अंततः जीत बंदूकों की ही होती है। यही कारण है कि विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान में तख्ता पलट की उल्टी गिनती वाकई शुरू हो चुकी है।
सिंध से बलूचिस्तान तक सुलगती आग
एक तरफ जहाँ रावलपिंडी में सत्ता के गलियारों में घमासान मचा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के विभिन्न प्रांत बगावत की आग में जल रहे हैं। सिंध में सेना और स्थानीय राष्ट्रवादी समूहों के बीच दुश्मनी अपने चरम पर है। अल्ताफ हुसैन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि राष्ट्रवादी समूहों और सेना के बीच यह टकराव जारी रहा, तो सिंध में बड़े पैमाने पर हिंसा और अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी।
वहीं बलूचिस्तान की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। वहां पाकिस्तानी सेना और बलूच स्वतंत्रता सेनानियों के बीच रोज खूनी संघर्ष हो रहा है। हुसैन ने पाकिस्तान की हुकूमत को आईना दिखाते हुए कहा कि बलूच जनता की आवाज को केवल हथियारों और जुल्म के दम पर नहीं दबाया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि बलूचिस्तान की समस्याओं का समाधान राजनीतिक नजरिए से नहीं निकाला गया और उन्हें अधिकार नहीं दिए गए, तो स्थिति जल्द ही पूर्णतः अनियंत्रित हो जाएगी।
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