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एक घंटा पहले
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पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के निर्णय के कई महीने बाद अब इसका गहरा असर पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में देखने को मिल रहा है। दोनों प्रांत इस समय गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं, जिसका सीधा प्रभाव कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लाखों-करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ने लगा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सिंध के राजनीतिक नेताओं और किसान संगठनों ने इसे प्रांत के लिए ‘आर्थिक नरसंहार’ तक कह डाला है।
आतंकवाद पर सख्ती और संधि का स्थगन
पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध सिर्फ सैन्य ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी कड़ा रवैया अपनाया। ऑपरेशन सिंदूर के साथ ही नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया, जिसे आतंकवाद के प्रति भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा माना गया। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस रुख में किसी प्रकार की नरमी न आने के स्पष्ट संकेत दिए।
रक्षा मंत्री ने कहा कि पहलगाम हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर भारत ने साफ कर दिया है कि जिनकी आंखों के आंसू सूख चुके हैं, उन्हें पानी भी नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सिंधु का जल आतंकवाद के संरक्षकों और मानवता के दुश्मनों तक नहीं पहुंचने दिया जाएगा। इस बयान को भारत की दीर्घकालिक नीति का संकेत माना जा रहा है।
सिंध प्रांत पर सबसे ज्यादा मार
पाकिस्तान में जल संकट का सबसे गहरा असर सिंध प्रांत में दिखाई दे रहा है। सिंध देश की आर्थिक राजधानी कराची का भी ठिकाना है और इसकी गिनती पाकिस्तान के सबसे अहम कृषि क्षेत्रों में होती है। सिंधु नदी पर बना सक्कर बैराज पूरे इलाके की सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यह बैराज लाखों एकड़ खेती की जमीन तक पानी पहुंचाता है और सिंध के साथ-साथ बलूचिस्तान के कई हिस्सों की खेती भी इसी पर टिकी है।
सूखती जा रहीं नहरें
पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक, सक्कर बैराज से निकलने वाली प्रमुख नहरों में पानी की भारी कमी दर्ज की गई है। नॉर्थ वेस्ट कैनाल में 64.1 प्रतिशत, राइस कैनाल में 38 प्रतिशत और दादू कैनाल में 82 प्रतिशत तक की कमी बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि यह स्थिति केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की खामियों और ऊपरी क्षेत्रों में कथित अतिरिक्त जल निकासी के चलते और गंभीर हुई है।
सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़ों के हवाले से स्थानीय रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पंजाब अपने तय हिस्से से कहीं ज्यादा पानी ले रहा है। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब को जहां 44,000 क्यूसेक पानी आवंटित है, वहीं वह 53,394 क्यूसेक तक पानी ले रहा है, जो निर्धारित हिस्से से करीब 21 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह तौंसा बैराज पर भी स्वीकृत मात्रा से ज्यादा पानी निकालने के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर चश्मा बैराज में जलस्तर बढ़ता दिख रहा है, जिससे यह धारणा और मजबूत हुई है कि ऊपरी इलाकों में पानी जमा किया जा रहा है, जबकि निचले हिस्सों तक पर्याप्त जल नहीं पहुंच पा रहा।
गरमाई पाकिस्तान की सियासत
जल संकट ने पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को भी गरमा दिया है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हाफिज नईम-उर-रहमान ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाली सिंध सरकार पर कराची और आसपास के इलाकों में पानी की समस्या हल करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया है। वहीं पीपीपी का कहना है कि संघीय सरकार और जल प्रबंधन संस्थाएं सिंध के साथ भेदभाव कर रही हैं।
पीपीपी सिंध के अध्यक्ष निसार अहमद खुहरो बार-बार आरोप लगा चुके हैं कि सिंध को उसका वैधानिक जल हिस्सा नहीं मिल पा रहा। उन्होंने कहा कि सिंध हर साल लगभग 55 लाख टन चावल का उत्पादन करता है और चावल निर्यात से करीब 1.4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा कमाता है। उनके मुताबिक खरीफ सीजन में पानी की कटौती से कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा और इसका खामियाजा पूरे प्रांत की अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा।
खुहरो ने चेतावनी देते हुए कहा कि सिंध देश के कुल कृषि उत्पादन में लगभग 67 प्रतिशत का योगदान देता है, इसके बावजूद उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दिया जा रहा। उन्होंने जल कटौती को सीधे तौर पर आर्थिक नरसंहार करार दिया।
किसानों पर गहराता संकट
इस संकट की सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ रही है। सक्कर बैराज की राइट बैंक नहर प्रणाली से सिंचित लरकाना, कंबर-शाहदादकोट, दादू, शिकारपुर और बलूचिस्तान के कुछ इलाकों में खेत सूखने लगे हैं। सिंध आबादगार बोर्ड के पूर्व पदाधिकारी इशाक मुगहरी के अनुसार कई इलाकों में किसान अभी तक धान की नर्सरी तक तैयार नहीं कर पाए हैं, क्योंकि नहरों के अंतिम छोर तक पानी पहुंच ही नहीं रहा।
उन्होंने बताया कि दादू कैनाल को जहां 4,995 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए, वहां केवल 860 क्यूसेक पानी पहुंच रहा है। नॉर्थ वेस्टर्न कैनाल को 6,260 क्यूसेक के मुकाबले 2,100 क्यूसेक और राइस कैनाल को 8,700 क्यूसेक के मुकाबले महज 5,300 क्यूसेक पानी मिल रहा है। इन आंकड़ों से ही संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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