पाकिस्तान में हिंदुओं को 'बर्दाश्त' करने का दावा करने वाले जरदारी, अपने देश के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में क्यों नाकाम हैं? विश्व 4 घंटे पहले 6
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा हिंदुओं को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी पर जावेद अख्तर ने तीखा प्रहार किया है, साथ ही पाकिस्तान में अन्य समुदायों की बदतर स्थिति पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।

आसिफ अली जरदारी का विवादित बयान और उस पर मचा बवाल

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने हाल ही में देश के स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ऐसा बयान दिया है, जिसने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी बहस को जन्म दे दिया है। जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान की मुस्लिम बहुल आबादी देश में रह रहे 3 से 4 फीसदी हिंदू समुदाय को 'बर्दाश्त' करती है और यहां हिंदू पूरी तरह से आजाद हैं। उनके इस बयान ने एक लोकतांत्रिक देश में नागरिक अधिकारों की परिभाषा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी समुदाय को 'बर्दाश्त' करने की भाषा का प्रयोग अपने आप में यह दर्शाता है कि वहां शासन संविधान से नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समुदाय की मर्जी या कृपा से चल रहा है। यदि नागरिक अधिकार कानून के बजाय किसी दूसरे समुदाय की सहनशीलता पर निर्भर हैं, तो यह उस देश की प्रशासनिक विफलता का बड़ा प्रमाण है।

तथ्यों की सच्चाई: क्या जरदारी सही बोल रहे हैं?

राष्ट्रपति जरदारी ने अपने भाषण में पाकिस्तान की हिंदू आबादी का जो आंकड़ा पेश किया है, वह सरकारी आंकड़ों से मेल नहीं खाता है। पाकिस्तान की 2023 की आधिकारिक जनगणना रिपोर्ट पर नजर डालें तो देश में हिंदुओं की जनसंख्या 2.17 फीसदी है, न कि 3-4 फीसदी जैसा कि राष्ट्रपति ने दावा किया था। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या लगभग 52 लाख है। अपनी ही जनता के बारे में गलत आंकड़े पेश करना एक राष्ट्राध्यक्ष के लिए गंभीर चूक मानी जा सकती है।

केवल हिंदू ही नहीं, अपने मुसलमानों को भी सुरक्षा नहीं दे पा रहा पाकिस्तान

विवाद केवल हिंदुओं को बर्दाश्त करने की शब्दावली तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान में धार्मिक और राजनीतिक दमन का शिकार होने वाले समुदायों की सूची काफी लंबी है। जब जरदारी अल्पसंख्यकों को बर्दाश्त करने की बात करते हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान अपनी ही मिट्टी के अन्य मुस्लिम समुदायों को समान न्याय और सुरक्षा प्रदान कर पा रहा है? देश में शिया मुसलमानों पर लगातार हो रहे आतंकी हमले इस बात का जीवंत उदाहरण हैं।

इस साल 6 फरवरी को इस्लामाबाद की खदीजा तुल कुबरा मस्जिद में हुए एक वीभत्स आत्मघाती हमले में कम से कम 31 लोगों की जान गई थी और 170 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी। इसके अलावा, अहमदिया समुदाय की स्थिति तो और भी दयनीय है। पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 260 स्पष्ट रूप से अहमदिया समुदाय को 'गैर-मुस्लिम' घोषित करता है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार 2026 में भी उनके खिलाफ हिंसा, भेदभाव और धार्मिक गतिविधियों पर पाबंदी के मामले लगातार दर्ज किए जा रहे हैं। साथ ही, बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों द्वारा जबरन लोगों को गायब करने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाते रहे हैं।

हिंदुओं का अस्तित्व और जावेद अख्तर का तंज

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हिंदुओं को आखिर 'बर्दाश्त' क्यों किया जा रहा है? पाकिस्तान में हिंदू समुदाय ने न तो कभी देश के खिलाफ हथियार उठाए हैं और न ही किसी तरह की देशद्रोही गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इसके विपरीत, वहां का हिंदू समुदाय तो हर रोज अपनी और विशेषकर अपनी महिलाओं की गरिमा और जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में एक राष्ट्रपति द्वारा 'बर्दाश्त' करने जैसे शब्द का इस्तेमाल करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा करने वाला है।

प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने जरदारी के इस बयान पर एक्स (पूर्व में ट्विटर) के माध्यम से करारा कटाक्ष किया है। उन्होंने जरदारी को 'मिस्टर 10 परसेंट' संबोधित करते हुए लिखा कि जो व्यक्ति 10 फीसदी से कम आबादी वाले समूहों के प्रति हमेशा से असंवेदनशील रहा है, वह हिंदुओं को बर्दाश्त करने की बातें कर रहा है। उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा, 'पाकिस्तान के मिस्टर जरदारी, जो बेनजीर भुट्टो से विवाह के बाद चर्चा में आए थे, अब यह दावा कर रहे हैं कि वे अपने देश में 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को बर्दाश्त करते हैं। मिस्टर जरदारी, यह स्पष्ट है कि आप 10 प्रतिशत से कम आबादी वाले किसी भी समुदाय के प्रति सदैव असंवेदनशील रहे हैं।'

जावेद अख्तर की यह टिप्पणी केवल भारत और पाकिस्तान के बीच की जुबानी जंग नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान में धार्मिक आजादी और अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों के हनन के उस कड़वे सच को सामने लाती है, जिससे दुनिया भर की निगाहें अक्सर चुराई जाती हैं। जरदारी का यह बयान उनकी अपनी सरकार की विफलता को ढंकने की एक कमजोर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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