पाकिस्तान में न्याय का गला घोंटा गया, 12 साल बाद ईसाई दंपत्ति को जिंदा जलाने के सभी आरोपी रिहा विश्व 20 घंटे पहले 6
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद वीभत्स हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी दोषियों को बरी कर दिया है। साल 2014 में एक ईसाई दंपत्ति को ईंट-भट्टे की आग में जिंदा झोंक दिया गया था, लेकिन सबूतों की कमी का हवाला देते हुए अब कोई भी आरोपी सजा के दायरे में नहीं है।

पाकिस्तान में न्याय की हार और दोषियों की रिहाई

पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करीब 12 साल पहले घटित हुई एक ऐसी बर्बर घटना, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था, उसमें अब कानून की नजर में कोई भी गुनहगार नहीं बचा है। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई दंपत्ति शहजाद मसीह और उनकी गर्भवती पत्नी शमा बीबी की नृशंस हत्या के मामले में मौत की सजा पाए आखिरी तीन दोषियों को भी बरी कर दिया है। इस फैसले के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इसे न्याय का जनाजा निकलने जैसा बता रहे हैं।

क्या थी 4 नवंबर 2014 की वह खौफनाक घटना

यह दिल दहला देने वाली घटना पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित कसूर जिले में हुई थी। 26 साल के शहजाद मसीह और उनकी 24 वर्षीय पत्नी शमा बीबी एक स्थानीय ईंट-भट्टे पर काम करते थे। जानकारी के मुताबिक, उनका ईंट-भट्टे के मालिक के साथ पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद चल रहा था, जिसके चलते मालिक ने उन्हें वहां से कहीं जाने की अनुमति नहीं दी थी। इसी विवाद को दबाने के लिए दंपत्ति पर ईशनिंदा जैसा गंभीर और झूठा आरोप मढ़ा गया। आरोप लगाया गया कि दंपत्ति ने कुरान के पन्नों का अपमान किया है। इसके बाद एक स्थानीय मौलवी ने मस्जिद के लाउडस्पीकर का दुरुपयोग करते हुए भीड़ को भड़काया। देखते ही देखते करीब 1000 से ज्यादा लोगों की हिंसक भीड़ वहां जमा हो गई और उन्होंने इस बेकसूर दंपत्ति को बर्बरता का शिकार बनाया।

भीड़ का क्रूर चेहरा और दंपत्ति की मौत

उत्तेजित भीड़ ने पहले शहजाद मसीह और शमा बीबी की बेरहमी से पिटाई की। उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के बाद उस हिंसक भीड़ ने दंपत्ति को ईंट-भट्टे की धधकती आग में जिंदा झोंक दिया। यह घटना उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रही थी और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की असुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हुए थे।

अदालती प्रक्रिया और कमजोर होती कानूनी पकड़

घटना के कुछ समय बाद, पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधी अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए 5 मुख्य आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी, जबकि 8 अन्य दोषियों को जेल की सजा दी गई थी। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीतता गया, ऊपरी अदालतों में केस कमजोर होता चला गया। सबूतों के अभाव का हवाला देकर धीरे-धीरे दोषियों को एक-एक कर छोड़ा जाने लगा।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

बीते 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अंतिम तीन दोषियों की फांसी की सजा को भी पलट दिया और उन्हें बरी करने का आदेश दे दिया। कोर्ट की दलील थी कि पुलिस ने मामले की जांच और सबूत जुटाने में गंभीर लापरवाही बरती है। अभियोजन पक्ष इस हत्याकांड में ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह विफल रहा। इसके साथ ही अदालत ने पंजाब सरकार की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें हिंसा में शामिल अन्य 102 आरोपियों को रिहा किए जाने के खिलाफ आपत्ति जताई गई थी।

अल्पसंख्यकों में गहरा असंतोष

इस फैसले पर धार्मिक नेताओं ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। बिशप सैमसन शुकार्डिन, जो कि पाकिस्तान कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष हैं, ने एक कैथोलिक चैरिटी संस्था को दिए साक्षात्कार में इस निर्णय पर गहरा शोक और खेद व्यक्त किया है। फैसलाबाद के बिशप इंद्रियास रहमत ने कहा कि इन दोषियों की रिहाई उसी पुराने ढर्रे का हिस्सा है, जहां पाकिस्तान में ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ होने वाली लक्षित हिंसा के बाद उन्हें कभी न्याय नहीं मिल पाता है। यह घटना साबित करती है कि पाकिस्तान की न्याय प्रणाली अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और न्याय देने में किस कदर अक्षम है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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