विश्व
2 घंटे पहले
6
विचारों
पाकिस्तान में सेना की सर्वोच्चता का नया अध्याय
पाकिस्तान के भीतर एक ऐसा बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है जिसने वहां के पूरे सैन्य ढांचे को हिलाकर रख दिया है। देश ने पांच दशक पुराने सैन्य सिस्टम को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है और सत्ता की वास्तविक चाबी अब असीम मुनीर के हाथों में सौंप दी है। नए कानून के लागू होने के साथ ही असीम मुनीर केवल सेना प्रमुख नहीं रह गए हैं, बल्कि वे तीनों सेनाओं के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के रूप में एक सुपर बॉस बनकर उभरे हैं। इस ऐतिहासिक और चौंकाने वाले कदम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान में आने वाले समय में कौन असली सत्ता चलाएगा। इस निर्णय के चलते असीम मुनीर का कार्यकाल अब नवंबर 2030 तक के लिए पूरी तरह सुनिश्चित हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने वहां की चुनी हुई नागरिक सरकार और प्रधानमंत्री को बेहद कमजोर और लाचार स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।
50 साल पुरानी व्यवस्था का अंत और नई कमान
पाकिस्तान के रक्षा इतिहास में अब तक तीनों सेनाओं यानी थल सेना, नौसेना और वायु सेना के प्रमुख अपनी-अपनी शाखाओं के स्वतंत्र मुखिया हुआ करते थे। ऊपर से देखने पर जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन का पद अवश्य था, लेकिन वह पद केवल दिखावटी और परामर्श तक ही सीमित था। उस भूमिका में न तो कोई कानूनी ताकत थी और न ही किसी प्रकार का ऑपरेशनल कंट्रोल। नए कानून ने इस पुरानी व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंका है। अब डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर्स का गठन किया गया है जिसके प्रमुख खुद असीम मुनीर हैं।
- तीनों सेनाओं पर सीधा नियंत्रण: अब पाकिस्तान की आर्मी, नेवी और एयरफोर्स का पूरा कानूनी और ऑपरेशनल नियंत्रण सीधे तौर पर असीम मुनीर के पास है।
- कार्यकाल का विस्तार: नए एक्ट के माध्यम से मुनीर अब नवंबर 2030 तक अपने पद पर बने रहेंगे, जो किसी भी नेता की सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
- नागरिक सरकार की स्थिति: देश की रक्षा नीति, कूटनीति और सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों में प्रधानमंत्री और संसद की भूमिका अब केवल उन निर्णयों पर मुहर लगाने वाली मशीन जैसी रह गई है।
क्यों बदलना पड़ा 50 साल पुराना सैन्य ढांचा
पाकिस्तान सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम को विशेषज्ञों ने किसी स्वेच्छा से लिया गया फैसला नहीं, बल्कि भारी मजबूरी का परिणाम माना है। सरकार के सामने तीन ऐसी गंभीर चुनौतियां थीं जिनके कारण यह बदलाव अनिवार्य हो गया था।
बदलती वैश्विक युद्ध तकनीक
आज के दौर में युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों जैसे बंदूकों या टैंकों तक सीमित नहीं हैं। साइबर अटैक, उन्नत ड्रोन और अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकियों ने युद्ध लड़ने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। इस आधुनिक परिदृश्य में तीनों सेनाओं का अलग-अलग रहकर काम करना अब लगभग असंभव हो गया था।
अंतर-सेवा समन्वय का अभाव
पुराने सिस्टम में एयरफोर्स, नेवी और आर्मी की रणनीतियां अक्सर एक-दूसरे से मेल नहीं खाती थीं। इस तालमेल की कमी का सीधा असर पाकिस्तान की सैन्य क्षमता पर पड़ता था और अक्सर उन्हें नुकसान उठाना पड़ता था। इन आंतरिक मतभेदों को समाप्त करने के लिए तीनों को एक ही कमान के तहत लाना समय की मांग बन गया था।
फैसलों में देरी का जोखिम
किसी भी युद्ध या आपातकाल की स्थिति में तीनों सेनापतियों के बीच लंबी बैठकें समय की बर्बादी का कारण बनती थीं। आधुनिक युद्ध में देरी का अर्थ है विनाश, इसलिए तुरंत फैसले लेने की शक्ति को केंद्रित करना आवश्यक समझा गया।
असीम मुनीर का विवादित ट्रैक रिकॉर्ड
एक तरफ जहां असीम मुनीर को असीमित शक्तियां दी गई हैं, वहीं उनका पिछला ट्रैक रिकॉर्ड उनके फैसलों पर बड़े सवाल खड़े करता है। वे हर मोर्चे पर अपनी नाकामियों के कारण आलोचनाओं का शिकार रहे हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में आम जनता के बढ़ते आक्रोश और विरोध प्रदर्शनों को शांत करने में उनकी रणनीति बुरी तरह विफल रही है। इसके अलावा, बलूचिस्तान में BLA और स्थानीय विद्रोहियों द्वारा चीनी प्रोजेक्ट्स और सैन्य ठिकानों पर लगातार हो रहे हमलों को रोकने में भी वे असहाय नजर आए हैं।
भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उनका पूरा सुरक्षा कवच पूरी तरह विफल साबित हुआ था। अफगानिस्तान के मोर्चे पर भी तालिबान के साथ बढ़ते तनाव और सीमा पार से TTP के हमलों ने उनकी सैन्य रणनीति की पोल खोल दी है। इन तमाम विफलताओं के बावजूद उन्हें मिला यह प्रमोशन उनकी योग्यता नहीं, बल्कि उनकी गलतियों और नाकामियों को छिपाने की एक सोची-समझी कोशिश प्रतीत होता है।
Comments
0 comment