धान के किसानों के लिए जरूरी खबर: यूरिया डालते समय न करें ये गलती, कृषि वैज्ञानिक ने बताया इस्तेमाल का सही समय और तरीका छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 2
धान की रोपाई के दौरान यूरिया के गलत इस्तेमाल से फसल की पैदावार घट सकती है। बालोद के कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.आर. गौर ने किसानों को यूरिया छिड़कने का सही समय और वैज्ञानिक तरीका बताया है।

डीएपी और यूरिया के संतुलित इस्तेमाल का सही तरीका

छत्तीसगढ़ राज्य में इस समय खरीफ के मौसम की हलचल काफी तेज है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में किसान धान की रोपाई के काम में पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। धान की इस महत्वपूर्ण अवस्था में खेतों में सही तरीके से खाद और उर्वरक का प्रबंधन करना बेहद आवश्यक होता है। अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव में किसान भाई गलत समय पर या गलत मात्रा में उर्वरकों का उपयोग कर बैठते हैं, जिससे फसल को पूरा फायदा नहीं मिल पाता और लागत भी बढ़ जाती है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. ए.आर. गौर ने किसानों के लिए बेहद उपयोगी और वैज्ञानिक सलाह साझा की है। उन्होंने धान की फसल में यूरिया के संतुलित और सही इस्तेमाल के बारे में विस्तार से बताया है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.आर. गौर के मुताबिक, धान की रोपाई के वक्त आमतौर पर हमारे किसान भाई दो प्रमुख प्रकार के फॉस्फेट उर्वरकों का सहारा लेते हैं। इनमें पहला उर्वरक डीएपी है और दूसरा सिंगल सुपर फॉस्फेट है। किसानों को इन दोनों खादों के इस्तेमाल का सही तरीका पता होना चाहिए ताकि फसलों को अधिकतम पोषण मिल सके।

वैज्ञानिक ने बताया कि यदि कोई किसान भाई धान की रोपाई के समय खेत में डीएपी का इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे इसके साथ पोटाश का भी मिश्रण अवश्य मिलाना चाहिए। चूंकि डीएपी में पहले से ही नाइट्रोजन की एक निश्चित मात्रा पायी जाती है, इसलिए रोपाई के ठीक बाद अलग से यूरिया डालने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा करने से न केवल खाद की बर्बादी बचती है, बल्कि पौधों को आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन मिलने का खतरा भी टल जाता है।

यूरिया की पहली और दूसरी किस्त देने का सही समय

डॉ. गौर ने यूरिया के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। उन्होंने बताया कि जो किसान रोपाई करने से पहले अपने खेतों में सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करते हैं, उन्हें यूरिया के छिड़काव को लेकर विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐसे किसानों को धान की रोपाई संपन्न होने के 7 से 10 दिनों के भीतर ही यूरिया की पहली किस्त खेत में डाल देनी चाहिए। शुरुआती दिनों में नाइट्रोजन मिलने से पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और उनका शुरुआती विकास तेजी से होता है। यूरिया की इस पहली खुराक में प्रति एकड़ करीब 20 से 25 किलोग्राम मात्रा का इस्तेमाल करना पूरी तरह पर्याप्त रहता है।

इसके बाद यूरिया की दूसरी किस्त की बारी आती है। चाहे आपने रोपाई के वक्त डीएपी का छिड़काव किया हो या फिर सिंगल सुपर फॉस्फेट का, दोनों ही परिस्थितियों में यूरिया की दूसरी किस्त का समय एक समान रहता है। किसानों को धान की रोपाई के लगभग 25 से 30 दिन बीत जाने के बाद यूरिया की दूसरी किस्त देनी चाहिए। यह वह समय होता है जब धान के पौधों में नए कंसे यानी कल्ले फूटने लगते हैं। इस महत्वपूर्ण अवस्था में पौधों को नाइट्रोजन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसलिए इस समय प्रति एकड़ लगभग 30 से 35 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद साबित होता है।

कृषि विशेषज्ञ ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर किसान भाई अपनी फसल में जिंक सल्फेट का उपयोग करना चाहते हैं, तो उन्हें इसे यूरिया की दूसरी किस्त के साथ मिलाकर ही खेतों में डालना चाहिए। यूरिया के साथ जिंक सल्फेट मिलाने से पौधों को जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व तो मिलते ही हैं, साथ ही यूरिया की कार्यक्षमता और उसका असर भी काफी हद तक बढ़ जाता है।

शाम 4 बजे के बाद ही क्यों करना चाहिए यूरिया का छिड़काव?

वैज्ञानिक रूप से यूरिया डालने के समय का भी पैदावार पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। डॉ. गौर ने किसानों को सलाह दी है कि यूरिया का छिड़काव हमेशा दोपहर ढलने के बाद, यानी शाम 4 बजे के बाद ही करना चाहिए। इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण काम करता है। दोपहर की तेज धूप और गर्मी के बाद, शाम के समय हवा और मिट्टी का तापमान थोड़ा कम हो जाता है। कम तापमान होने के कारण यूरिया में मौजूद महत्वपूर्ण नाइट्रोजन तत्व अमोनिया गैस के रूप में उड़ने से बच जाता है।

जब नाइट्रोजन हवा में गैस बनकर नहीं उड़ती, तो इसकी पूरी मात्रा मिट्टी के जरिए सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचती है, जिससे फसल को पूरा पोषण मिलता है। उन्होंने आगे बताया कि यदि किसी व्यावहारिक कारण से किसान शाम के वक्त यूरिया का छिड़काव नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें इस नुकसान से बचने के लिए एक अन्य तरीका अपनाना चाहिए। ऐसी स्थिति में किसान यूरिया को अकेले डालने के बजाय उसमें जिंक या सल्फर युक्त उर्वरकों को मिलाकर इस्तेमाल करें। इससे नाइट्रोजन गैस के रूप में उड़ने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और फसल को नुकसान नहीं होता।

अंत में डॉ. गौर ने सभी किसान भाइयों से अपील की है कि वे कृषि वैज्ञानिकों द्वारा दी गई इस सलाह को जरूर अपनाएं। खेतों में खादों का संतुलित और सही समय पर उपयोग करने से न केवल खेती की लागत में कमी आती है, बल्कि धान की गुणवत्ता और पैदावार में भी बेहतरीन बढ़ोतरी देखने को मिलती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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