रासायनिक खाद से तौबा: बिहार के छपरा में जैविक खेती की नई क्रांति, तिल के जरिए घर पर ही तैयार हो रही तगड़ी खाद बिहार एक घंटा पहले 3
बिहार के छपरा जिले के एक प्रगतिशील किसान संजीव कुमार ने रासायनिक खाद का इस्तेमाल बंद कर दिया है। कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर वे तिल और अन्य प्राकृतिक उत्पादों की मदद से घर पर ही जैविक खाद तैयार कर बंपर मुनाफा कमा रहे हैं।

बिहार के कृषि क्षेत्र में इन दिनों एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य के किसान अब पारंपरिक रासायनिक खेती को छोड़कर जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। सरकार द्वारा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही योजनाओं और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन का असर अब जमीन पर साफ दिखने लगा है। इसी कड़ी में छपरा जिले के एक प्रगतिशील किसान ने रासायनिक खादों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। यह किसान अपने ही खेत में प्राकृतिक तरीकों से बेहद असरदार जैविक खाद तैयार कर रहे हैं, जिससे फसलों की पैदावार में भारी बढ़ोतरी हो रही है और खेती की लागत भी काफी कम हो गई है।

कृषि विज्ञान केंद्र से मिला प्रशिक्षण और बदला खेती का नजरिया

हम बात कर रहे हैं छपरा जिले के गरखा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले बभनैया गांव के निवासी किसान संजीव कुमार की। संजीव कुमार ने रासायनिक खादों के नुकसान और जैविक खेती के फायदों को समझा और इस दिशा में काम करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी से जैविक खेती का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। वैज्ञानिकों से मिले मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के बाद संजीव के खेती करने का तरीका पूरी तरह से बदल गया। आज वे बेहद कम खर्चे में और न्यूनतम मेहनत के साथ अपने खेतों में तगड़ी फसल उगा रहे हैं। उनका यह अनूठा आइडिया न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ा रहा है, बल्कि खेत की मिट्टी की सेहत को भी सुधार रहा है।

तिल की मदद से ऐसे तैयार होती है अनोखी जैविक खाद

किसान संजीव कुमार ने इस समय अपने खेत में धान की रोपाई की तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन इसके लिए वे किसी रासायनिक खाद का ऑर्डर देने के बजाय अपने ही खेत में जैविक खाद तैयार कर रहे हैं। इस अनोखे प्रयोग के बारे में संजीव कुमार बताते हैं कि वे धान लगाने से पहले अपने खेतों में तिल की फसल बोते हैं।

तिल से खाद बनाने की पूरी प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • सबसे पहले खेत में तिल की बुवाई की जाती है।
  • जब तिल का पौधा लगभग 30 से 35 दिन का हो जाता है और इसकी ऊंचाई 1 से डेढ़ फीट तक पहुंच जाती है, तब इसकी जोताई की तैयारी की जाती है।
  • इस अवस्था में रोटरी (रोटावेटर) मशीन की मदद से पूरे खेत की गहरी जोताई करवा दी जाती है।
  • जोताई के बाद तिल के कोमल पौधे पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाते हैं और बहुत ही कम समय में सड़कर एक बेहतरीन जैविक खाद का रूप ले लेते हैं।

संजीव बताते हैं कि तिल की फसल की यह खूबी है कि इसे किसी भी मौसम में उगाकर जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। जुताई के बाद खेत को कुछ दिनों के लिए ऐसे ही छोड़ दिया जाता है, जिससे यह हरी खाद पूरी तरह सक्रिय हो जाती है।

मिट्टी को मिलता है भरपूर पोषण

खेत की मिट्टी में तिल के पौधों के सड़ने से उसमें कार्बन, फाइबर और अन्य जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा में भारी बढ़ोतरी होती है। रासायनिक खादों के लगातार इस्तेमाल से बंजर हो रही मिट्टी की उर्वरक शक्ति को वापस पाने में यह विधि बेहद कारगर साबित हो रही है। इस जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की जल धारण क्षमता भी बढ़ती है, जिससे फसलों को लंबे समय तक नमी मिलती रहती है। धान की रोपाई से पहले इस तरह खेत तैयार करने से फसल बेहद मजबूत और रोगमुक्त होती है, जिससे किसानों को सीधा और बड़ा मुनाफा मिलता है।

घर के संसाधनों से बनाते हैं अन्य जैविक खाद

तिल के अलावा संजीव कुमार अपने स्तर पर भी कई तरह की जैविक खाद तैयार करते हैं। वे बाजार से महंगी रासायनिक खादें खरीदने के बजाय घर पर ही मौजूद प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए वे निम्नलिखित सामग्रियों का उपयोग करते हैं:

  • घर की गाय का गोबर और गौमूत्र
  • हरी घास और प्राकृतिक पत्तियां
  • गुड़ और उपजाऊ मिट्टी

इन सभी चीजों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर वे जो जैविक खाद तैयार करते हैं, वह बाजार में मिलने वाली किसी भी रासायनिक खाद से कई गुना अधिक शक्तिशाली और फायदेमंद होती है। इससे पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से मिल जाते हैं।

लागत में भारी कमी, कमाई में इजाफा और अन्य किसानों को मुफ्त सीख

संजीव कुमार बताते हैं कि पिछले कई सालों से वे इसी पद्धति से जैविक खेती कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी से मिले प्रशिक्षण के बाद उनके खेती के खर्च में भारी कमी आई है, जिससे उनका शुद्ध मुनाफा काफी बढ़ गया है। रासायनिक खादों पर होने वाला उनका खर्च अब लगभग शून्य हो गया है। संजीव की इस सफलता और उनके अनोखे कृषि मॉडल को देखकर अब आसपास के और दूर-दराज के इलाकों से भी किसान उनके पास खेती के गुर सीखने आ रहे हैं। संजीव कुमार भी पूरी उदारता के साथ अन्य किसानों को यह विधि बिल्कुल मुफ्त में सिखा रहे हैं। उनके इस प्रयास से प्रेरित होकर क्षेत्र के कई अन्य किसानों ने भी रासायनिक खादों का प्रयोग बंद कर दिया है और जैविक खेती अपनाकर अपनी कमाई में बढ़ोतरी कर रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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