दिल्ली, मुंबई हो या पटना: कड़े निर्भया कानून के बावजूद आखिर क्यों नहीं थम रहे बच्चियों से दरिंदगी के मामले? राष्ट्रीय राजनीति 4 घंटे पहले 2
देशभर में महिलाओं और मासूम बच्चियों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए क्यों निर्भया कानून के बावजूद धरातल पर स्थितियां नहीं बदल पा रही हैं।

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई हो, बिहार का बक्सर हो या फिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटा नोएडा, देश का कोई भी हिस्सा आज हमारी बेटियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। महिलाओं और मासूम बच्चियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के मामलों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने एक बार फिर पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। वर्ष 2012 के ऐतिहासिक निर्भया कांड के बाद देश में अत्यंत सख्त कानून बनाए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद डरावनी है। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इतने कड़े कानूनों और तमाम दावों के बावजूद हमारी बेटियां आखिर कब तक इस दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी?

हालिया वारदातें जिन्होंने देश की आत्मा को झकझोर दिया

पिछले केवल 10 दिन के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से आई बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं ने सुरक्षा के दावों की पोल खोलकर रख दी है। मुंबई से आई एक बेहद दर्दनाक खबर के अनुसार, स्कूल से लौटते वक्त एक केवल 3 साल की मासूम बच्ची के साथ स्कूल वैन के ड्राइवर ने ही दरिंदगी की वारदात को अंजाम दिया। जब बच्ची वैन में अकेली बची, तो सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले चालक के भीतर का शैतान जाग गया और उसने इस मासूम को अपनी हवस का शिकार बना डाला। इस घटना ने स्कूल प्रशासन और निजी वैन चालकों पर मिलने वाले भरोसे को पूरी तरह से तोड़ दिया है।

वहीं, बिहार के बक्सर से भी एक अत्यंत शर्मनाक मामला सामने आया, जहां ज्ञान का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल के भीतर ही शिक्षकों ने अपनी छात्राओं के साथ दुष्कर्म किया। शिक्षक, जिन्हें समाज में माता-पिता के बाद सबसे ऊंचा स्थान दिया जाता है, उनके द्वारा किया गया यह कृत्य समाज के नैतिक पतन को दर्शाता है। इसके अलावा, नोएडा से दिल्ली के बीच करीब 47 किलोमीटर के लंबे सफर के दौरान एक 16 साल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की सनसनीखेज वारदात ने यह साबित कर दिया है कि हमारी सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कितनी लचर है। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि स्कूल वैन हो, बस हो या स्वयं स्कूल परिसर, हमारी बच्चियों के लिए कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं रह गया है।

निर्भया कानून और उसके बाद हुए कानूनी बदलाव

वर्ष 2012 में 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई निर्भया के साथ बर्बरता की घटना ने पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था। इस घटना के विरोध में देश के कोने-कोने से लोग सड़कों पर उतर आए थे। जनता के भारी आक्रोश को देखते हुए कानून व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग की गई। इसके लिए जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया गया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 पारित किया गया। इसे आम बोलचाल की भाषा में निर्भया कानून या निर्भया एक्ट कहा गया। इसके साथ ही पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए निर्भया फंड की भी स्थापना की गई थी।

कागजों और कानूनी प्रावधानों के स्तर पर इस कानून ने बलात्कार की पूरी परिभाषा और सजा के प्रावधानों को बदलकर रख दिया। इसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  • बलात्कार की परिभाषा का विस्तार: निर्भया कानून के लागू होने से पहले केवल पेनाइल पेनिट्रेशन को ही बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता था। नए कानून के तहत शरीर के किसी भी हिस्से या किसी बाहरी वस्तु के जरिए किए जाने वाले पेनिट्रेशन तथा ओरल सेक्स को भी बलात्कार के दायरे में शामिल किया गया।
  • नए गंभीर अपराधों को जोड़ना: महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्य अपराधों जैसे एसिड अटैक, स्टॉकिंग (पीछा करना), वोयरिज्म (ताक-झांक) और यौन उत्पीड़न को भी कानून में स्पष्ट रूप से शामिल कर उनके लिए सजा तय की गई।
  • सजा की अवधि में भारी बढ़ोतरी: सामूहिक बलात्कार (गैंग रेप) के मामलों में न्यूनतम सजा को बढ़ाकर कम से कम 20 साल कर दिया गया, जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है।
  • मृत्युदंड का कड़ा प्रावधान: यदि बलात्कार की वारदात के कारण पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह वेजिटेटिव अवस्था में चली जाती है, तो अपराधियों के लिए मृत्युदंड (फांसी की सजा) का प्रावधान किया गया।
  • सहमति की उम्र सीमा में बदलाव: शारीरिक संबंधों के लिए सहमति की कानूनी उम्र को 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दिया गया।
  • नाबालिगों के लिए सख्त नियम: किशोर न्याय कानून में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि जघन्य अपराधों के मामलों में 16 से 18 साल के नाबालिग आरोपियों पर भी वयस्कों की तरह ही मुकदमा चलाया जा सकेगा।

NCRB के आंकड़े: क्या वाकई कम हुए हैं अपराध?

तमाम कानूनी सख्ती और नए प्रावधानों के बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। NCRB के वार्षिक आंकड़े इस कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं कि निर्भया कानून के आने के बाद भी देश में बलात्कार के दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि हुई है:

  • वर्ष 2012 में देश भर में बलात्कार के दर्ज मामलों की संख्या 24,923 थी।
  • वर्ष 2013 में कानून बनने के बाद यह संख्या तेजी से बढ़कर 33,707 हो गई।
  • वर्ष 2014 में यह आंकड़ा और बढ़ा और 36,735 तक पहुंच गया।
  • वर्ष 2016 में दर्ज मामलों की संख्या अपने रिकॉर्ड स्तर यानी 38,947 पर पहुंच गई।
  • इसके बाद के वर्षों में दर्ज मामलों की संख्या औसतन 31,000 से 33,000 के बीच बनी रही।
  • वर्ष 2020 में COVID महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण मामलों में थोड़ी गिरावट आई और यह संख्या 28,046 दर्ज की गई।
  • वर्ष 2022 में एक बार फिर मामले बढ़े और यह आंकड़ा 31,516 पर पहुंच गया।
  • वर्ष 2023 में कुल 29,670 मामले दर्ज किए गए।
  • वर्ष 2024 में बलात्कार के दर्ज मामलों की संख्या लगभग 29,536 रही।

सरकारी एजेंसियों और पुलिस प्रशासन का यह तर्क रहता है कि आंकड़ों में यह बढ़ोतरी वास्तविक अपराधों के बढ़ने की वजह से नहीं है। उनका मानना है कि निर्भया कांड के बाद महिलाओं में कानून को लेकर जागरूकता बढ़ी है, थानों में शिकायत दर्ज कराने का डर कम हुआ है और महिलाएं अब अपने अधिकारों के लिए खुलकर बोलने लगी हैं, जिसके कारण मामलों की रिपोर्टिंग अधिक हो रही है। लेकिन इस तर्क के बीच यह भी हकीकत है कि 1 साल, 2 साल या 3 साल की मासूम बच्चियां, जो अपनी पीड़ा को शब्दों में बयां भी नहीं कर सकतीं, वे भी आज लगातार इन दरिंदों का शिकार हो रही हैं।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी और बेहद कम सजा दर

अपराधियों के मन में कानून का डर न होने की सबसे बड़ी वजह हमारी लचर न्यायिक प्रक्रिया और सजा मिलने की बेहद धीमी गति है। आंकड़ों के अनुसार, देश में बलात्कार के मामलों में सजा मिलने की दर (कन्विकशन रेट) आज भी महज 27 प्रतिशत के आसपास ही बनी हुई है। इसका सीधा और डरावना मतलब यह है कि करीब 73 प्रतिशत आरोपी कानूनी पेचीदगियों, कमजोर जांच, गवाहों के मुकर जाने या समय पर ठोस सबूत न मिल पाने के कारण बिना किसी सजा के बरी हो जाते हैं।

केवल कागजों पर सजा को कड़ा कर देने से अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। जब तक पुलिस की कार्यप्रणाली संवेदनशील नहीं होगी, अदालतों में मुकदमों का निपटारा तेजी से नहीं होगा और अपराधियों को तुरंत सजा नहीं मिलेगी, तब तक अपराधियों के हौसले बुलंद ही रहेंगे।

अपराध के बाद नहीं, अपराध से पहले सुरक्षा की है दरकार

निर्भया कानून के बाद जितने भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए, वे मुख्य रूप से अपराध हो जाने के बाद अपराधियों को दी जाने वाली सजा से संबंधित थे। लेकिन आज के समय में देश को एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जहां कोई भी अपराधी इस तरह के घिनौने अपराध को अंजाम देने से पहले सौ बार सोचे। इसके लिए केवल कानूनी बदलाव ही काफी नहीं हैं, बल्कि प्रशासनिक मुस्तैदी, सामाजिक जागरूकता और पारिवारिक स्तर पर भी व्यापक सुधारों की आवश्यकता है।

आज समाज में नैतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास हो रहा है और हम अपनी बेटियों को एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करने में असफल साबित हो रहे हैं। कानून का कड़ा होना आवश्यक है, लेकिन केवल कानून के भरोसे समाज को नहीं बदला जा सकता। जब तक घरों में बेटों को महिलाओं के सम्मान की शिक्षा नहीं दी जाएगी, स्कूलों में सुरक्षा और संवेदनशीलता की संस्कृति विकसित नहीं होगी और समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आएगा, तब तक ये डरावने आंकड़े हमें शर्मसार करते रहेंगे।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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