डेयरी बिजनेस में छोटी सी चूक से ठप हो सकता है दूध का उत्पादन, पशु चिकित्सक ने दिया रबर बेड इस्तेमाल करने का सुझाव बिहार एक घंटा पहले 3
पशुपालन के व्यवसाय में गाय और भैंस के रखरखाव में थोड़ी सी लापरवाही भी दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर भारी पड़ सकती है। विशेषज्ञ डॉक्टर का कहना है कि साफ-सफाई और सही बैठने की जगह का प्रबंध कर पशुपालक बड़े आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं।

पशुपालन में आधुनिक तकनीक और सावधानी की जरूरत

भारत में पशुपालन का कार्य सदियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, लेकिन समय के साथ इसमें क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। वर्तमान समय में पशुपालन केवल जीवनयापन का साधन नहीं, बल्कि एक बड़े उद्योग में तब्दील हो चुका है। शहरों से लेकर गांवों तक डेयरी का व्यवसाय तेजी से फैल रहा है। आज के दौर में कई लोग बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त करके उन्नत और वैज्ञानिक तरीके से पशुओं का पालन-पोषण कर रहे हैं। हालांकि, अभी भी कुछ पशुपालक ऐसे हैं जो अपने मवेशियों के रखरखाव में लापरवाही बरतते हैं। यह छोटी सी लापरवाही उनके पूरे डेयरी व्यवसाय को बड़े आर्थिक नुकसान की ओर धकेल सकती है।

थनैला रोग का खतरा और उसका असर

जहानाबाद जिला पशुपालन कार्यालय में पदस्थ वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर प्रकाश चंद्र हिमांशु के अनुसार, दुधारू पशुओं का रखरखाव ही उनकी उत्पादकता का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पशु हमारे लिए एक कीमती पूंजी की तरह हैं और उनकी सुरक्षा में ही किसान की भलाई है। डॉक्टर हिमांशु का मानना है कि अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालक अपने मवेशियों को बिना किसी योजना के कहीं भी बैठने के लिए छोड़ देते हैं।

गाय और भैंस के बैठने के लिए गलत और ऊबड़-खाबड़ जगह का चयन थनैला रोग जैसी गंभीर बीमारियों को न्योता देता है। जब पशु किसी गंदी या सख्त जगह पर बैठते हैं, तो उनके थन पर अनावश्यक दबाव पड़ता है। इस दौरान रगड़ लगने, चोट पहुंचने या गंदगी के कारण संक्रमण होने का खतरा बना रहता है। इससे थनों में सूजन आ जाती है, जो दूध के उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित करती है।

दूध सूखने का डर और इलाज में देरी

पशु चिकित्सक का कहना है कि जब पशु को थनों में सूजन या संक्रमण जैसी समस्या होती है, तो वे तुरंत दूध देना कम कर देते हैं। यदि इस स्थिति को नजरअंदाज किया जाए और समय रहते उचित उपचार न मिले, तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां गाय या भैंस का दूध पूरी तरह सूख जाए। यह पशुपालकों के लिए एक बड़ी आर्थिक त्रासदी के समान है। पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि वे मवेशियों को केवल पौष्टिक आहार ही न दें, बल्कि उनके रहने के स्थान की साफ-सफाई और आराम पर भी पूरा ध्यान दें।

रबर बेड का महत्व और किफायती समाधान

इस समस्या से निजात पाने के लिए डॉक्टर हिमांशु ने रबर बेड के उपयोग को एक सरल और प्रभावी तरीका बताया है। उनके अनुसार, गाय और भैंस को रबर के बेड पर बैठाने की व्यवस्था करने से पशुओं को काफी आराम मिलता है। रबर बेड का इस्तेमाल करने के प्रमुख फायदे निम्नलिखित हैं:

  • थन का बचाव: रबर बेड की समतल सतह पर बैठने से थनों पर अनुचित दबाव नहीं पड़ता, जिससे चोट और सूजन का खतरा कम हो जाता है।
  • संक्रमण की रोकथाम: यह सतह संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया को थनों के संपर्क में आने से रोकती है, जिससे बीमारियों का जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
  • आसान उपलब्धता: रबर बेड बाजार में बहुत आसानी से उपलब्ध हैं और पशुपालक इन्हें सरलता से खरीद सकते हैं।
  • आर्थिक सुरक्षा: एक रबर बेड की कीमत लगभग 2000 रुपये होती है, जो होने वाले संभावित भारी नुकसान की तुलना में बहुत मामूली निवेश है।

अंत में, पशुपालकों को यह समझना होगा कि उनके पशुओं का स्वास्थ्य ही उनके व्यवसाय की असली सफलता है। साफ-सुथरा वातावरण और आरामदायक बैठने की व्यवस्था करके वे न केवल दूध का उत्पादन बढ़ा सकते हैं, बल्कि पशुओं को लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य भी प्रदान कर सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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