अंतरिक्ष में हैरान कर देने वाला नजारा: मंगल के चांद फोबोस के पीछे ओझल हुई हमारी पृथ्वी अमेरिका एक घंटा पहले 3
नासा के परसीवरेंस रोवर ने मंगल ग्रह की सतह से एक ऐतिहासिक तस्वीर कैद की है, जिसमें पृथ्वी को फोबोस के पीछे छिपते हुए देखा जा सकता है। यह अद्भुत घटना मात्र 40 सेकंड की है जिसने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को भी अचंभित कर दिया है।

मंगल से दिखा अंतरिक्ष का अद्भुत खेल

अंतरिक्ष की गहराइयों में एक ऐसा नजारा सामने आया है जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। नासा के परसीवरेंस रोवर ने मंगल ग्रह से एक ऐसी ऐतिहासिक घटना रिकॉर्ड की है जिसे हम पृथ्वीवासियों ने पहले कभी नहीं देखा था। इस बार हमारी अपनी पृथ्वी को मंगल ग्रह के छोटे से चंद्रमा फोबोस के पीछे छिपते हुए देखा गया है। यह वाकई में एक अविश्वसनीय अनुभव है क्योंकि मंगल की सतह से पृथ्वी केवल एक चमकते हुए बिंदु जैसी नजर आती है। इस दुर्लभ घटना को 2 जुलाई 2026 को रोवर के अत्याधुनिक मास्टकैम-जेड कैमरे के जरिए दर्ज किया गया। जिस समय यह घटना घटी, वह मिशन का 1907वां मंगल दिवस यानी सोल था। यह पल न केवल खगोल विज्ञान के नजरिए से महत्वपूर्ण है बल्कि यह उस तकनीकी क्षमता को भी दर्शाता है जिसे नासा ने मंगल की सतह पर तैनात किया है।

घटना का क्रम और वैज्ञानिकों की हैरानी

परसीवरेंस रोवर मंगल पर स्थित जेजेरो क्रेटर के पास खोजबीन कर रहा है। यहीं से कैमरे ने इस घटना को पांच अलग-अलग फ्रेम में कैद किया। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि पृथ्वी फ्रेम के ऊपरी बाएं कोने से निचले दाएं हिस्से की तरफ बढ़ रही थी। वहीं, दूसरी ओर फोबोस निचले बाएं कोने से ऊपर की तरफ गति कर रहा था। जैसे ही दोनों एक दूसरे के सामने आए, फोबोस ने पृथ्वी को पूरी तरह से अपनी ओट में ले लिया। यह पूरी प्रक्रिया कुल 40 सेकंड तक चली। यह दृश्य शाम के लगभग 7 बजे रिकॉर्ड किया गया, जो मंगल पर सूर्यास्त होने के लगभग 40 मिनट बाद का समय था। इन तस्वीरों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने माना है कि अंतरिक्ष में इस तरह की स्थिति का सटीक मिलान करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।

फोबोस क्यों है इतना खास?

आप यह सोच रहे होंगे कि एक विशाल पृथ्वी के सामने फोबोस जैसा छोटा सा चांद इतना प्रभावशाली कैसे दिख सकता है। इसका उत्तर उसकी बनावट और स्थिति में छिपा है। फोबोस का आकार किसी आलू की तरह ऊबड़-खाबड़ है और इसकी चौड़ाई केवल 27 किलोमीटर यानी 17 मील है। अगर हम इसे पृथ्वी के चांद से तुलना करें, जिसका व्यास करीब 3475 किलोमीटर है, तो फोबोस काफी बौना नजर आता है। फोबोस की असली ताकत उसकी मंगल ग्रह के साथ निकटता है। यह मंगल की सतह से मात्र 7800 किलोमीटर की दूरी पर चक्कर लगाता है। यह दूरी पृथ्वी और चंद्रमा की दूरी की तुलना में लगभग पचास गुना कम है। इसी नजदीकी की वजह से फोबोस दूर से देखने पर एक बड़ा और प्रभावशाली खगोलीय पिंड प्रतीत होता है।

दूरी का गणित और पृथ्वी का स्वरूप

जब ये तस्वीरें ली गई थीं, तब पृथ्वी मंगल से करीब 314 मिलियन किलोमीटर की विशाल दूरी पर स्थित थी। यह फासला पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से भी दोगुना से अधिक है। इतनी अधिक दूरी के कारण, कैमरे में कैद हुई हमारी पृथ्वी केवल एक छोटे से पिक्सेल के रूप में चमकती हुई दिखाई दे रही थी। नासा के विशेषज्ञों के अनुसार, यह तस्वीर एक अनोखे 'अर्थ सेल्फ-पोर्ट्रेट' की तरह है, जिसे किसी दूसरे ग्रह की सतह से लिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में मार्क लेमन जैसे वैज्ञानिकों की योजना और थोड़ी सी किस्मत का भी अहम योगदान रहा, जिन्होंने इस दुर्लभ घटना को रिकॉर्ड करने के लिए सटीक समय का निर्धारण किया था।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शब्दावली

खगोल विज्ञान में ऐसी घटनाओं के लिए अलग-अलग शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। इस मामले में, जो परसीवरेंस ने रिकॉर्ड किया, उसे 'ऑकल्टेशन' कहा जाता है। ऑकल्टेशन तब होता है जब एक बड़ा दिखने वाला पिंड किसी दूसरे पिंड के सामने आकर उसे पूरी तरह ब्लॉक कर देता है। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के मास्टकैम-जेड के डिप्टी प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर जस्टिन माकी ने इसे एक अनूठा अनुभव बताया है। उन्होंने कहा कि यह तस्वीर मंगल की सतह से लिए गए एक दुर्लभ 'फोटोबॉम्ब' जैसी है। वहीं, को-इन्वेस्टिगेटर मार्क लेमन ने स्पष्ट किया कि फोबोस मंगल के आसमान से दिन में तीन बार गुजरता है, लेकिन पृथ्वी के साथ उसका बिल्कुल सटीक संरेखण होना बहुत दुर्लभ है, जिसके लिए पहले से व्यापक तैयारी करनी पड़ती है।

भविष्य के लिए संभावनाएं

यह पहला मौका नहीं है जब मंगल के आसमान में ऐसी खगोलीय घटनाएं देखी गई हैं, लेकिन पृथ्वी का फोबोस के पीछे छिपना निश्चित रूप से एक यादगार घटना बन गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में जब भी मानवयुक्त मिशन मंगल पर पहुंचेंगे, तो वहां से अंतरिक्ष को देखने का नजरिया और भी विस्तृत होगा। फिलहाल, ऐसी घटनाओं के जरिए हम न केवल मंगल के वायुमंडल और उसके चंद्रमाओं को बेहतर समझ रहे हैं, बल्कि ब्रह्मांड में हमारी स्थिति के बारे में भी नई जानकारियां मिल रही हैं। अभी तक अगली किसी ऐसी बड़ी ऑकल्टेशन की तारीख निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन नासा के वैज्ञानिक निरंतर इस दिशा में काम कर रहे हैं कि भविष्य के मार्स मिशन के दौरान और भी अधिक सटीकता के साथ ऐसी घटनाओं को कैमरे में कैद किया जा सके।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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