उत्तराखंड
2 घंटे पहले
5
विचारों
पहाड़ का वह कवि, जिसकी आवाज बनी क्रांति
उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू और यहां के आम आदमी के संघर्षों को अपनी कविताओं में पिरोने वाले जनकवि गिरीश तिवारी 'गिर्दा' को आज उनकी पुण्यतिथि पर याद किया जा रहा है। गिर्दा केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वह उत्तराखंड के उस जन-चेतना के प्रतीक थे, जिसने समाज के अंतिम व्यक्ति तक अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस जगाया। उन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाकर पहाड़ के जंगलों, जमीनों और रोजगार जैसे ज्वलंत मुद्दों को पूरे देश के सामने रखा।
आंदोलनों को मिली गिर्दा के गीतों की ताकत
गिर्दा का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके लिखे शब्द केवल कागजों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे लोगों की जुबान और आंदोलनों की धड़कन बन गए। उनके योगदान को लेकर कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- वन बचाओ आंदोलन के दौरान उनके गीतों ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश घर-घर तक पहुंचाया।
- उत्तराखंड राज्य निर्माण के ऐतिहासिक आंदोलन में गिर्दा की रचनाओं ने प्रदर्शनकारियों में अद्भुत जोश भरने का काम किया।
- उन्होंने सत्ता के गलियारों के बजाय आम लोगों के हक और उनके संघर्ष को अपनी कला का मुख्य केंद्र बनाया।
अविस्मरणीय विरासत
22 अगस्त 2010 को गिरीश तिवारी 'गिर्दा' ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनके विचार आज भी उत्तराखंड की हवाओं में जीवित हैं। उनका पूरा जीवन संघर्षों और चुनौतियों से घिरा रहा, इसके बावजूद उन्होंने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से कभी समझौता नहीं किया। आज भी जब उत्तराखंड में कोई जन-आंदोलन होता है, तो गिर्दा के गीत ही सबसे पहले गूंजते हैं। वे केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि पहाड़ की वह बुलंद आवाज थे, जो आज भी अपने गीतों के जरिए लोगों को प्रेरित कर रही है।
Comments
0 comment