मुजफ्फरपुर: श्मशान घाट पर चलती 'अपन पाठशाला' में बच्चे सीख रहे मिथिला पेंटिंग, हुनर से बन रहे आत्मनिर्भर बिहार 2 महीने पहले 71
मुजफ्फरपुर के एक श्मशान घाट परिसर में चल रही 'अपन पाठशाला' के बच्चे न केवल स्कूली शिक्षा ले रहे हैं, बल्कि मिथिला पेंटिंग के जरिए अपनी कला को भी निखार रहे हैं। यह पहल बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही पारंपरिक संस्कृति से भी जोड़ रही है।

शिक्षा के साथ कौशल का अनूठा संगम

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक अनूठी मिसाल देखने को मिल रही है, जहां श्मशान घाट के परिसर में चलने वाली 'अपन पाठशाला' के बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा के साथ-साथ पारंपरिक लोक कलाओं में भी पारंगत हो रहे हैं। यहां शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बच्चों को जीवन में आत्मनिर्भर बनाना भी है। वर्तमान में इस पाठशाला में 28 बच्चे नियमित पढ़ाई के साथ-साथ प्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग का गहन प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

कला और संस्कृति की ओर बढ़ते कदम

इन बच्चों द्वारा तैयार की जा रही कलाकृतियां अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बच्चे इन दिनों विशेष रूप से लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की थीम पर आधारित पेंटिंग्स बनाने में जुटे हुए हैं। इसके अतिरिक्त, वे पारंपरिक मिथिला शैली में राधा-कृष्ण, मछली, मोर, विभिन्न पक्षियों और धार्मिक स्थलों के जीवंत चित्र कागज पर उकेर रहे हैं। इन पेंटिंग्स में उपयोग किए गए रंग और उनकी पारंपरिक आकृतियां लोगों को काफी आकर्षित कर रही हैं।

हुनर से मिली आर्थिक पहचान

पाठशाला के संचालक सुमित कुमार का मानना है कि बच्चों को ऐसे कौशल सिखाना बेहद जरूरी है जिससे वे भविष्य में अपने पैरों पर खड़े हो सकें। सुमित कुमार के अनुसार, बच्चों द्वारा बनाई गई इन सुंदर पेंटिंग्स की कीमत 100 से 150 रुपये के बीच तय की गई है। स्थानीय स्तर पर इन कलाकृतियों की अच्छी मांग है। लोग न केवल इन्हें घरों के लिए खरीद रहे हैं, बल्कि कई लोग किसी को सम्मानित करने के दौरान अंगवस्त्र के साथ उपहार के रूप में भी इनका उपयोग कर रहे हैं।

बच्चों में बढ़ता आत्मविश्वास

इस पहल ने बच्चों के भीतर उत्साह का संचार किया है। पाठशाला की छात्रा माही कहती हैं कि मिथिला पेंटिंग बिहार की एक प्राचीन और गौरवशाली कला है। उनके लिए पढ़ाई के दौरान इस विधा को सीखना एक नया अनुभव है, जो उन्हें अपनी संस्कृति को करीब से जानने का अवसर दे रहा है। सुमित कुमार का कहना है कि जब बच्चों को उनकी मेहनत का फल मिलता है, तो उनका मनोबल काफी बढ़ जाता है। अपनी कला के लिए सम्मान और आर्थिक प्रोत्साहन पाकर वे अपनी पढ़ाई और पेंटिंग दोनों को बेहतर बनाने के लिए अधिक प्रेरित महसूस करते हैं।

बदलाव की एक उम्मीद

जिस स्थान को सामान्यतः नकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है, उसी श्मशान घाट परिसर में शुरू की गई 'अपन पाठशाला' की यह पहल आज कई बच्चों के जीवन में नई आशा की किरण बनकर उभरी है। यह केंद्र अब साबित कर रहा है कि उचित मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण मिले, तो बच्चे किसी भी विपरीत परिस्थिति में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं। शिक्षा और आत्मनिर्भरता का यह मिश्रण न केवल बच्चों को हुनरमंद बना रहा है, बल्कि समाज के प्रति उनके नजरिए में भी सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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