'मेरी आंखों के सामने जिंदा जल गए ससुर...' इलाज के लिए बेच दी थी जमीन, पर अस्पताल ने छीन लिया जीवन उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 2
मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा स्थित प्रसाद हॉस्पिटल के ICU में लगी भीषण आग में 10 लोगों की मौत की खबर है, जबकि आधिकारिक तौर पर अब तक 4 लोगों के मरने की पुष्टि हुई है। ससुर का इलाज करा रही एक महिला ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि उनके सामने ही मरीज आग की लपटों में घिर गए।

बिहार के मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा थाना क्षेत्र में स्थित प्रसाद हॉस्पिटल में गुरुवार की सुबह हुए भयावह अग्निकांड ने कई परिवारों को ऐसा घाव दिया है, जिसे शायद वे ताउम्र नहीं भुला पाएंगे। अस्पताल के ICU में लगी आग ने महज कुछ ही मिनटों में कई जिंदगियों को अपनी चपेट में ले लिया। प्रशासन की ओर से अभी तक 4 लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि की गई है, हालांकि मृतकों की संख्या और बढ़ने की आशंका है। दूसरी ओर कई लोग इस हादसे में 10 मरीजों के मारे जाने का दावा कर रहे हैं।

जमीन बेचकर करा रही थीं ससुर का इलाज

मनियारी थाना क्षेत्र के बगाही गांव की रहने वाली संगीता कुमारी की आंखों में उस खौफनाक रात का मंजर अब भी जस का तस बसा हुआ है। संगीता बताती हैं कि उनके ससुर बृजनंदन राय एक सड़क हादसे में घायल होने के बाद पिछले 4 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे। बेहतर इलाज की उम्मीद में परिवार ने उन्हें प्रसाद हॉस्पिटल में दाखिल कराया था।

संगीता के मुताबिक, ससुर के इलाज के लिए परिवार ने अपनी जमीन तक बेच दी थी, लेकिन किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यही अस्पताल उनकी मौत की वजह बन जाएगा।

आंखों के सामने जलते रहे ससुर

संगीता बताती हैं कि गुरुवार तड़के करीब 3 बजे वह ICU के बाहर बैठी हुई थीं। तभी अचानक अंदर अफरा-तफरी मच गई। मरीज और उनके परिजन दरवाजों और खिड़कियों के शीशे तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश करने लगे। जब उन्होंने ICU के भीतर झांका तो उनके ससुर आग की लपटों से घिरे हुए थे।

मैं उन्हें बचाने के लिए अंदर भागना चाहती थी, पर आग इतनी भयानक थी कि एक कदम भी आगे नहीं रख सकी। मेरी आंखों के सामने मेरे ससुर जल रहे थे और मैं कुछ भी नहीं कर पाई।

इतना कहते-कहते संगीता फफक कर रो पड़ती हैं।

प्रत्यक्षदर्शी ने बयां की खौफनाक रात

उस रात का दृश्य याद करते हुए प्रत्यक्षदर्शी शशांक कुमार भी सिहर उठते हैं। उनके अनुसार, ICU में करीब 30 से अधिक मरीज भर्ती थे। आग भड़कते ही लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। कई मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर ही बाहर की ओर दौड़ पड़े, तो कुछ लोगों ने खिड़कियों के शीशे तोड़कर बाहर निकलने का प्रयास किया।

हम लोग अपने मरीजों को चादर में लपेटकर किसी तरह बाहर निकाल रहे थे। अगर शुरुआत में जिस बेड पर आग लगी थी, उसे तुरंत अलग कर दिया जाता तो शायद हालात इतने भयावह नहीं होते।

शशांक कुमार का कहना है कि शुरुआती लापरवाही ने इस हादसे को और भीषण बना दिया।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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