मध्य प्रदेश
2 महीने पहले
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वर्षा ऋतु का आगमन प्रकृति में नई जान फूंक देता है। चारों तरफ फैली हरियाली आंखों को सुहावनी लगती है, लेकिन यही मौसम घर के बगीचे, किचन गार्डन और पेड़-पौधों के लिए कई बड़ी चुनौतियां भी लेकर आता है। लगातार होने वाली तेज बारिश, गमलों या क्यारियों में जलभराव, तेज हवाओं के थपेड़े और उमस के कारण फंगस का हमला पौधों को पूरी तरह बर्बाद कर सकता है। अगर बागवानी के शौकीन शुरुआत में ही कुछ जरूरी कदम नहीं उठाते हैं, तो उनकी महीनों की मेहनत पल भर में नष्ट हो सकती है। बेल वाली सब्जियां हों, पत्तेदार फसलें हों या फिर फलदार वृक्ष, मानसून के दौरान विशेष देखभाल की दरकार होती है।
मध्य प्रदेश के सतना जिले के सोहावल विकासखंड की उद्यान विकास अधिकारी सुधा पटेल ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि बारिश के दिनों में पौधों की सुरक्षा के लिए जल निकासी की सही व्यवस्था, जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल और नियमित देखरेख सबसे अहम पहलू हैं। इन आसान उपायों को अपनाकर आप अपने बगीचे को हरा-भरा रखने के साथ-साथ बेहतर उत्पादन भी प्राप्त कर सकते हैं।
जल निकासी की उत्तम व्यवस्था: पौधों को सड़ने से बचाना है सबसे पहला काम
उद्यान विकास अधिकारी के अनुसार, मानसून के दौरान पौधों को सबसे अधिक क्षति जड़ों में पानी जमा होने से पहुंचती है। अत्यधिक नमी के कारण जड़ें गलने लगती हैं और पौधा धीरे-धीरे दम तोड़ देता है। इससे बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय करने चाहिए:
- पौधों को कभी भी पूरी तरह समतल जमीन पर लगाने की भूल न करें। इसके बजाय उन्हें हमेशा क्यारियों में लगाना चाहिए।
- क्यारियों के साथ-साथ गहरी नालियां या फरो बनाना बेहद आवश्यक है। इससे बारिश का अतिरिक्त पानी बिना रुके तुरंत बाहर बह जाता है।
- सब्जियों और नाजुक पौधों के लिए जमीन की सामान्य सतह से थोड़ी ऊंची क्यारियां यानी रेज्ड बेड तैयार करें। यह तकनीक जड़ों को अत्यधिक पानी के संपर्क में आने से बचाती है और हवा का प्रवाह बेहतर रखती है।
तेज हवा और मूसलाधार बारिश से सुरक्षा: पौधों को दें स्टेकिंग का सहारा
बरसात के मौसम में केवल पानी ही नहीं, बल्कि तेज चलने वाली हवाएं भी पौधों के लिए काल साबित होती हैं। टमाटर, मिर्च और बैंगन जैसी फसलों के तने काफी कोमल होते हैं जो तेज हवा या भारी बारिश के दबाव में बहुत आसानी से टूट सकते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ ने स्टेकिंग प्रक्रिया को अपनाने की सलाह दी है। इसके तहत नाजुक पौधों के पास मजबूत लकड़ी या बांस की खपच्ची गाड़ दी जाती है और पौधे को रस्सी की मदद से उससे सहारा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, पौधों के निचले हिस्से की पुरानी और पीली पड़ चुकी पत्तियों को समय-समय पर काटते रहना चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी में पनपने वाला फंगस सीधे पत्तियों तक नहीं पहुंच पाता और पौधे के निचले हिस्से में हवा का आवागमन सुचारू रूप से होता रहता है।
मचान विधि: बेल वाली सब्जियों को सड़ांध से बचाने का अचूक नुस्खा
लौकी, तोरई, करेला, कद्दू और कुंदरू जैसी बेल वाली सब्जियों की खेती या बागवानी करने वालों को मानसून में अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। आमतौर पर लोग इन बेलों को जमीन पर ही फैलने देते हैं, लेकिन बरसात में ऐसा करना भारी पड़ सकता है। गीली मिट्टी के लगातार संपर्क में रहने से बेलें सड़ने लगती हैं और फल भी खराब हो जाते हैं।
सुधा पटेल का कहना है कि इन बेलों को बांस, लोहे के पतले तार या प्लास्टिक नेट की सहायता से मचान या ट्रेलिस पर चढ़ाना चाहिए। मचान विधि से फल सीधे तौर पर गीली जमीन और जमा पानी से दूर रहते हैं। इससे फंगस और सड़ांध का खतरा लगभग खत्म हो जाता है और पैदा होने वाले फल भी बिल्कुल साफ और उत्तम गुणवत्ता के होते हैं।
कंद और पत्तेदार फसलों की सुरक्षा: पानी की मार से बचाना है जरूरी
आलू, शकरकंद, गाजर और मूली जैसी कंद वाली फसलों की सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी जड़ों के पास पानी न ठहरे। यदि इन फसलों की क्यारियों में पानी जमा हो गया, तो कंद जमीन के भीतर ही सड़कर नष्ट हो जाएंगे। इसलिए इन्हें हमेशा ऊंची क्यारियों में ही उगाएं और दो क्यारियों के बीच गहरी नाली का निर्माण सुनिश्चित करें।
दूसरी तरफ, पालक, धनिया, चौलाई और मेथी जैसी नाजुक पत्तेदार सब्जियां बारिश की बूंदों की सीधी मार को सहन नहीं कर पाती हैं। तेज बौछारों से इनके पत्ते मिट्टी में दब जाते हैं और गल जाते हैं। इनके बचाव के लिए बगीचे में अस्थायी शेड नेट लगाना चाहिए या फिर पारदर्शी प्लास्टिक की पन्नी का इस्तेमाल कर एक सुरक्षात्मक ढाल बनानी चाहिए ताकि पानी सीधे इन पर न गिरे और इन्हें पर्याप्त रोशनी भी मिलती रहे।
फलदार पौधों के लिए रिंग मेथड: तने को रखें पानी से दूर
नींबू, अमरूद, पपीता और अनार जैसे फलदार पौधों के मामले में सबसे बड़ी चुनौती उनके मुख्य तने को सड़न से बचाना होती है। विशेषज्ञ के अनुसार, इन पौधों की जड़ों के पास पानी का जमाव रोकने के लिए रिंग मेथड यानी अंगूठीनुमा घेरा विधि का प्रयोग करना चाहिए।
इसके तहत पौधे के मुख्य तने के ठीक चारों ओर मिट्टी का एक ऊंचा टीला या घेरा बना दिया जाता है, जिससे पानी सीधे तने को नहीं छू पाता। अतिरिक्त पानी इस घेरे के बाहर बनी नाली से होकर बह जाता है। इस आसान उपाय से जड़ों के सड़ने और कवक रोगों के फैलने की आशंका बहुत कम हो जाती है।
कीटों और फंगस का हमला: रसायनों से बचें, अपनाएं ये प्राकृतिक उपाय
बरसात के उमस भरे मौसम में हानिकारक कीटों, इल्लियों और फंगल संक्रमण का प्रकोप अचानक बहुत बढ़ जाता है। इनसे निपटने के लिए रसायनों के बजाय जैविक और सुरक्षित तरीकों का उपयोग करना चाहिए:
- नीम के तेल का छिड़काव: रस चूसने वाले हानिकारक कीटों और इल्लियों से बचाव के लिए 1 लीटर पानी में 5 मिली नीम का तेल मिलाएं और उसमें थोड़ा सा लिक्विड शैम्पू या साबुन डालकर अच्छी तरह हिलाएं। इस मिश्रण का पौधों पर छिड़काव करने से कीट दूर रहते हैं।
- स्वदेशी अर्क का प्रयोग: यदि कीटों का हमला बेहद गंभीर रूप ले चुका है, तो घर पर तैयार किए गए विशेष दशपर्णी अर्क और अग्न्यास्त्र का छिड़काव करना बेहद असरदार साबित होता है।
- फंगस रोधी छिड़काव: कवक या फंगस के संक्रमण को रोकने के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी या स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस की 5 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर पौधों की जड़ों और पत्तों पर अच्छी तरह छिड़कना चाहिए।
- पारंपरिक कवकनाशी: तांबे के बर्तन में तैयार किया गया ताम्रयुक्त मट्ठा और बोर्डो मिश्रण भी बेहतरीन जैविक कवकनाशी के रूप में कार्य करते हैं, जो पौधों को संक्रमण मुक्त रखते हैं।
खाद देने का सही समय और खरपतवार नियंत्रण की रणनीति
विशेषज्ञ सुधा पटेल का कहना है कि मानसून के दौरान खाद देने के तौर-तरीकों में भी बदलाव करना आवश्यक है। इस मौसम में हमेशा पूरी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद (वर्मी कंपोस्ट) का ही प्रयोग करना चाहिए।
पौधों को त्वरित पोषण प्रदान करने के लिए जीवामृत, पंचगव्य या वेस्ट डी-कंपोजर का पतला घोल बनाकर हर 10 से 15 दिन के अंतराल पर मिट्टी में डालना अत्यंत लाभकारी होता है। हालांकि, भारी बारिश के दौरान या तेज वर्षा की चेतावनी होने पर खाद डालने से बचना चाहिए, क्योंकि पानी के बहाव के साथ पोषक तत्व भी बह जाते हैं। जब बारिश रुक जाए और मिट्टी में केवल हल्की नमी बची हो, तभी खाद और जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करें।
इसके साथ ही, बगीचे में उगने वाले अनावश्यक खरपतवारों को नियमित रूप से उखाड़कर फेंकते रहें। ये अनचाहे पौधे मुख्य पौधों का पोषण, धूप और पानी छीन लेते हैं और बीमारियों व कीटों को पनपने का सुरक्षित ठिकाना देते हैं। नियमित रूप से हल्की गुड़ाई करने से मिट्टी में हवा का संचार बना रहता है जिससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और उनका विकास बेहतर होता है।
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