धर्म
एक घंटा पहले
4
विचारों
जीवन का एक नया मोड़
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में स्थित रक्सौल का दसमुखी काली न्यास मंदिर आज लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर के पीठाधीश्वर सेवक संजय नाथ जी महाराज अपनी आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ लोक कल्याण के कार्यों के लिए भी चर्चा में रहते हैं। एक साधारण परिवार में जन्मे संजय नाथ जी महाराज का जीवन सफर बेहद प्रेरणादायक है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते हुए जीवन के बहुत शुरुआती दौर में ही संन्यास का कठिन मार्ग चुन लिया था।
स्वामी विवेकानंद से प्रेरित संन्यास
संजय नाथ जी महाराज का जन्म एक सामान्य कायस्थ परिवार में हुआ था और उनके पिता पेशे से एक होम्योपैथिक चिकित्सक थे। किशोरावस्था में वे अन्य युवाओं की तरह ही अपनी शिक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर थे। हालांकि, उनके कोमल मन पर स्वामी विवेकानंद के तेजस्वी विचारों और व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पड़ा। स्वामी विवेकानंद के आदर्शों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मात्र 17 वर्ष की उम्र में ही सांसारिक मोह-माया को त्यागकर संन्यास धारण करने का साहसी निर्णय ले लिया।
पटना से मद्रास यात्रा के दौरान महादेव का संकेत
महाराज के संन्यास लेने की कहानी भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि अपने जीवन के उस मोड़ पर वे उच्च शिक्षा के लिए इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के उद्देश्य से पटना से मद्रास की यात्रा पर निकले थे। इसी सफर के दौरान उन्हें नींद में भगवान शिव का दिव्य स्वप्न दिखाई दिया। महाराज के अनुसार, उस स्वप्न में उन्हें भगवान शिव ने संन्यास लेने और भविष्य में मंदिर निर्माण जैसे लोकहित के कार्यों में जुटने का स्पष्ट संकेत दिया था। यह अनुभव उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दोबारा भी हुआ और उन्होंने दावा किया कि स्वप्न में ही उन्हें महादेव से एक विशेष मंत्र की प्राप्ति भी हुई। इन अलौकिक अनुभवों ने उनके भीतर के वैराग्य को और अधिक प्रबल कर दिया, जिसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने और पूरी तरह से अध्यात्म को समर्पित होने का निर्णय लिया।
मंदिर निर्माण और परिवार की चिंता
उनके इस कठिन निर्णय का परिवार में काफी विरोध हुआ। विशेष रूप से उनकी मां को इस बात की गहरी चिंता सता रही थी कि संन्यास के बाद उनका पुत्र जीवन यापन के लिए भिक्षाटन करेगा। हालांकि, महाराज का अनुभव बिल्कुल अलग रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी किसी के सामने भिक्षा नहीं मांगी। वे निरंतर मां काली की भक्ति में लीन रहे और जो कुछ भी सहज रूप से उन्हें प्राप्त होता, उसी से अपना निर्वाह करते रहे। वर्ष 1990 में रामकिशुन राम नामक एक दयालु जमींदार ने उन्हें सात बीघा जमीन दान में दी। उसी भूमि पर मंदिर निर्माण का कार्य आरंभ हुआ और वर्ष 1993 में भव्य दसमुखी काली मंदिर बनकर तैयार हो गया।
समाज सेवा का संकल्प
संजय नाथ जी महाराज के जीवन का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है। वे मंदिर में आने वाले दान का उपयोग समाज के पिछड़े और जरूरतमंद वर्गों की सहायता के लिए करते हैं। शिक्षा, चिकित्सा, आवास और भोजन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में महाराज का योगदान निरंतर जारी है। धार्मिक साधना के साथ सेवा के इस संकल्प को उन्होंने अपने जीवन का अहम हिस्सा बनाया है। आज उनका यह सफर न केवल संतों के लिए बल्कि आम लोगों के लिए भी एक मिसाल बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि संकल्प शक्ति से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
Comments
0 comment