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एक घंटा पहले
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चार दशकों का लंबा सफर और फिर सलाखों के पीछे
यह कहावत बिल्कुल सच साबित हुई है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। एक ऐसे मामले ने सबको हैरान कर दिया है जहां एक हत्या का दोषी 40 वर्षों तक कानून की आंखों में धूल झोंककर समाज के बीच खुला घूमता रहा। उसने न केवल एक सामान्य जीवन जिया, बल्कि एक सरकारी शिक्षक के रूप में अपना पूरा करियर भी पूरा कर लिया। लेकिन अंत में, उसके पुराने किए गए गुनाहों की फाइल फिर से खुली और 73 वर्ष की उम्र में उसे दोबारा जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
साल 1983 की वो घटना और फरार होने की कहानी
पूरा मामला दिसंबर 1983 का है, जब हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को 30 दिनों की पैरोल पर रिहा किया गया था। नियमों के अनुसार, उसे तय समय सीमा के भीतर वापस जेल लौटना था। हालांकि, बाद में उसकी पैरोल की अवधि मार्च 1984 तक बढ़ा दी गई थी और उसे 18 मार्च को वापस रिपोर्ट करना था। नियत तारीख आने के बावजूद वह जेल नहीं लौटा। उस समय तंत्र की लापरवाही कहें या कोई अन्य कारण, उस कैदी की तलाश में कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए और वह धीरे-धीरे सरकारी रिकॉर्ड से ओझल हो गया।
शिक्षक बनकर बिताई 40 साल की जिंदगी
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जेल से भागने के बाद उस व्यक्ति ने अपनी पहचान छिपाकर एक नया जीवन शुरू किया। उसने न केवल अपनी जिंदगी का पुनर्निर्माण किया, बल्कि वह सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल करने में भी सफल रहा। इतने लंबे समय तक वह समाज में एक सम्मानित व्यक्ति की तरह रहता रहा। 40 साल के इस लंबे अंतराल में उसने बच्चों को पढ़ाया और अंततः वह सेवा से सेवानिवृत्त भी हो गया। यही नहीं, साल 2004 में उसे बेहतरीन शिक्षण कार्य के लिए सम्मानित भी किया गया। अपनी नई पहचान के साथ वह पूरी तरह से भूल चुका था कि कानून का एक पुराना पन्ना अभी भी उसके नाम पर बकाया है।
पुलिस की पकड़ में आया अपराधी
साल 2024 में आखिरकार पुलिस की एक कार्रवाई के दौरान उस फरार कैदी की पोल खुल गई। उस समय उसकी आयु 70 वर्ष से अधिक हो चुकी थी। लंबे समय तक कानून से बचने के बाद उसे दबोच लिया गया और उसे उसकी बाकी बची उम्रकैद की सजा काटने के लिए सीधे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। बुढ़ापे में जेल जाना उसके लिए एक बड़ा सदमा था।
हाईकोर्ट ने खारिज की राहत की याचिका
कैदी के पकड़े जाने के बाद, उसकी पत्नी ने तेलंगाना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में यह मांग की गई थी कि अपराधी की उम्र 73 वर्ष हो चुकी है और वह अत्यंत वृद्ध है, इसलिए उसे कुछ राहत दी जाए। पत्नी ने आग्रह किया कि तीन साल तक पैरोल न मिलने का जो नियम है, उसे उसके पति के मामले में शिथिल किया जाए। हालांकि, अदालत ने इस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने व्यवस्था की विफलता पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस टी. माधवी देवी ने इस पूरी घटना पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने इसे जेल प्रशासन और पुलिस तंत्र की एक बड़ी विफलता करार दिया कि एक अपराधी 40 वर्षों तक सिस्टम से छिपकर रह सका। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति को जेल में होना चाहिए था, उसने बिना किसी रुकावट के सरकारी नौकरी की और सेवानिवृत्त भी हो गया। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार की लापरवाही से अन्य कैदियों को गलत संदेश जाता है कि वे पैरोल पर बाहर जाकर कानून का उल्लंघन कर सकते हैं।
पैरोल प्रणाली में कड़ाई के निर्देश
तेलंगाना हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों के लिए एक अत्यंत मजबूत और पुख्ता ट्रैकिंग सिस्टम तैयार किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति न हो। अदालत ने अपने कड़े रुख से यह संदेश दिया है कि अपराध कभी भी पुराना नहीं होता और समय चाहे कितना भी बीत जाए, कानून के सामने हर किसी को अपने किए का हिसाब देना ही होगा। फिलहाल, वह बुजुर्ग कैदी जेल में अपनी सजा काट रहा है, जबकि उसके परिवार की उम्मीदें अदालत के इस फैसले के बाद खत्म हो गई हैं।
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