अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर 40 ट्रिलियन डॉलर का भारी कर्ज, क्या दुनिया के लिए खड़ी होने वाली है बड़ी आर्थिक मुसीबत व्यापार एक घंटा पहले 5
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका पर अब भारत की कुल जीडीपी के मुकाबले 10 गुना ज्यादा कर्ज का बोझ हो चुका है, जिसका असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर पड़ना तय माना जा रहा है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का पहाड़

एक पुरानी कहावत है कि ऊंची दुकान का पकवान फीका होता है। यदि हम इसे आज के समय में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर लागू करके देखें, तो कई हैरान कर देने वाली सच्चाईयां सामने आती हैं। अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे बड़े कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। यह कर्ज इतना विशाल है कि इसे चुकाना अमेरिका के लिए भी लगभग असंभव सा हो गया है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आने वाली कोई भी छोटी सी गिरावट अब पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती है।

ट्रेजरी सचिव का बड़ा ऐलान

मौजूदा आर्थिक संकट को थामने के लिए अमेरिका के वित्त मंत्री और ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कुछ कड़े फैसले लिए हैं, जिसका सीधा असर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर देखने को मिल सकता है। अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए काफी हद तक बॉन्ड बाजार पर निर्भर है। चूंकि कर्ज की सीमा अपनी चरम पर है, इसलिए बॉन्ड बाजार में भी अस्थिरता देखी जा रही है। बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण बाजार में गिरावट का रुख है। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए 19 अगस्त को वित्त मंत्रालय ने बॉन्ड बाजार में डेट बायबैक ऑपरेशन को दोगुना करने का आधिकारिक ऐलान किया है।

बायबैक प्रोग्राम को दोगुना करने के पीछे का कारण

अमेरिकी वित्त मंत्रालय को यह कठिन कदम उठाने के लिए तब मजबूर होना पड़ा, जब लॉन्ग टर्म ट्रेजरी यील्ड 20 साल के उच्च स्तर के पार निकल गई। अमेरिका पर वर्तमान में लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज लदा है, जो भारत की कुल अर्थव्यवस्था से करीब 10 गुना अधिक है। ट्रेजरी यील्ड को काबू में करने के लिए 9 सितंबर से बायबैक प्रोग्राम को बढ़ाकर 4 अरब डॉलर प्रति सेशन कर दिया गया है। यह फैसला विशेष रूप से 10 से 20 साल और 20 से 30 साल की अवधि वाले बॉन्ड के लिए लिया गया है, ताकि कर्ज की लागत को कम किया जा सके।

बॉन्ड बाजार की डगमगाती स्थिति

फिलहाल अमेरिकी बॉन्ड बाजार में भारी उथल पुथल मची हुई है। बॉन्ड की कीमतें लगातार गिर रही हैं, जिसकी वजह से यील्ड में निरंतर उछाल देखा जा रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 30 साल की ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.3 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई है, जबकि 10 साल वाली बॉन्ड यील्ड 4.7 फीसदी पर स्थिर है। इतना ही नहीं, 24 जून के बाद से 2 साल और 10 साल की बॉन्ड यील्ड के बीच 29 आधार अंक का अंतर दर्ज किया गया है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

क्यों बढ़ रही है ट्रेजरी यील्ड

अमेरिका में राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है, जो सरकार की चिंता का मुख्य कारण है। अनुमान के अनुसार, अमेरिकी खजाने पर 2.1 ट्रिलियन डॉलर का राजकोषीय घाटा है, जो उसकी जीडीपी का 6.4 फीसदी है। जब सरकार लगातार कर्ज लेती है, तो बॉन्ड में निवेश करने वाले निवेशकों पर दबाव बढ़ जाता है। बॉन्ड की कीमतों में गिरावट से यील्ड में बढ़ोतरी होती है, और इससे कर्ज तथा ब्याज भुगतान का एक अंतहीन चक्र शुरू हो जाता है। इसका सीधा असर यह है कि अमेरिका को अब अपने रक्षा बजट से ज्यादा रकम केवल ब्याज चुकाने में खर्च करनी पड़ रही है। इसके अलावा बच्चों के कल्याणकारी कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च से डेढ़ गुना अधिक राशि ब्याज के रूप में जा रही है।

एआई निवेश और कॉरपोरेट कर्ज का दबाव

अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर अतिरिक्त दबाव एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे बड़े निवेश की वजह से भी आया है। प्रमुख चिप कंपनी Nvidia ने 500 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई है, वहीं अन्य कंपनियों ने 200 अरब डॉलर के कॉरपोरेट बॉन्ड जारी किए हैं, जो अमेरिकी ट्रेजरी का लगभग 25 फीसदी हिस्सा है। इसके अलावा मेटा ने भी 420 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, जिससे कुल देनदारी बढ़कर 1.65 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। निवेशकों के लिए ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 6.4 फीसदी से 7.5 फीसदी तक पहुंच गई है, और 10 साल का बॉन्ड यील्ड भी 0.3 फीसदी बढ़ा है।

ईरान युद्ध का वैश्विक प्रभाव

ईरान के साथ जारी तनाव ने वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों को 118 डॉलर तक पहुंचा दिया है। अमेरिका में भी महंगाई दर बढ़कर 4.2 फीसदी हो गई है, जिससे वहां खुदरा तेल की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई हैं। महंगाई के डर से निवेशकों ने सुरक्षित निवेश के नाम पर लॉन्ग टर्म डेट में पैसा लगाना शुरू कर दिया है। इसी कारण 10 साल और 30 साल का बॉन्ड यील्ड बढ़कर क्रमशः 4.69 फीसदी और 5.21 फीसदी हो गया है। फेडरल चेयरमैन केविन वॉर्श के द्वारा ब्याज दरों पर कोई स्पष्ट फैसला न लेने के कारण भी बाजार में अनिश्चितता का माहौल है।

आम नागरिक और वैश्विक बाजार पर असर

इस संकट का सबसे गहरा असर अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ेगा। ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से लोन की औसत ब्याज दर बढ़कर 6.75 फीसदी तक पहुंच सकती है। इसका मतलब यह है कि होम लोन लेने वाले लोगों की ईएमआई में भारी बढ़ोतरी होगी और आम आदमी के लिए घर खरीदना एक सपना बन जाएगा। हाउसिंग बाजार में गिरावट और उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता कम होने से अमेरिका की कुल आर्थिक विकास दर सुस्त पड़ सकती है। यह स्थिति केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और जापान जैसे देशों के बाजारों पर भी पड़ेगा, जहां पहले से ही कर्ज लेने की लागत बढ़ चुकी है। अंत में, यह वैश्विक शेयर बाजारों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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