राष्ट्रीय राजनीति
3 घंटे पहले
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तमिलनाडु में स्थित कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विस्तार कार्य में एक अहम कामयाबी हाथ लगी है। 15 जून को परियोजना की यूनिट-5 के लिए रिएक्टर प्रेशर वेसल (आरपीवी) को उसके तय स्थान पर सफलतापूर्वक बैठा दिया गया। यह काम परियोजना के मुख्य डिजाइनर रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम के इंजीनियरिंग डिवीजन की भागीदारी से पूरा हुआ।
रिएक्टर प्रेशर वेसल को किसी भी परमाणु रिएक्टर का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इसी के भीतर परमाणु विखंडन की प्रक्रिया नियंत्रित परिस्थितियों में चलती है।
'ओपन टॉप' तकनीक से हुई स्थापना
रिएक्टर वेसल को 'ओपन टॉप' तकनीक के जरिए लगाया गया। इस तरीके में रिएक्टर भवन के ऊपरी गुंबद का निर्माण होने से पहले ही उच्च क्षमता वाले क्रेन की मदद से भारी उपकरणों को भवन के अंदर स्थापित किया जाता है।
यह वही तकनीक है जिसे भारत और रूस की संयुक्त टीम ने कुडनकुलम परियोजना के दूसरे चरण के निर्माण के दौरान भी सफलतापूर्वक आजमाया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पद्धति बड़े और भारी उपकरणों की सुरक्षित और सटीक स्थापना सुनिश्चित करती है।
रूस के एटोममाश संयंत्र में बना वेसल
यूनिट-5 में इस्तेमाल किया गया रिएक्टर प्रेशर वेसल रूस के रोस्तोव क्षेत्र के वोल्गोडोंस्क स्थित एटोममाश संयंत्र में तैयार किया गया। यह संयंत्र रोसाटॉम के मशीन-बिल्डिंग डिवीजन का हिस्सा है और दुनिया के प्रमुख परमाणु उपकरण निर्माण केंद्रों में गिना जाता है।
वर्ष 2025 में कुडनकुलम परियोजना तक पहुंचाए गए इस रिएक्टर वेसल का कुल वजन करीब 300 टन बताया गया है।
अब शुरू होगा मुख्य उपकरणों का एकीकरण
रिएक्टर प्रेशर वेसल की स्थापना पूरी होने के बाद अब परियोजना के अगले चरण में मुख्य रिएक्टर उपकरणों के एकीकरण का काम आरंभ किया जाएगा। इसके तहत कई अहम प्रणालियां स्थापित की जाएंगी:
- स्टीम जनरेटर
- मुख्य परिसंचरण पंप
- मुख्य कूलैंट पाइपलाइन मॉड्यूल
- प्रेसराइजर
- इमरजेंसी कोर कूलिंग सिस्टम टैंक
इन सभी प्रणालियों के एकीकृत हो जाने के बाद रिएक्टर के यांत्रिक और सुरक्षा से जुड़े परीक्षणों का रास्ता खुलेगा।
भारत-रूस परमाणु सहयोग की मिसाल
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना भारत और रूस के बीच दशकों पुराने रणनीतिक सहयोग का बड़ा उदाहरण मानी जाती है। फिलहाल यहां रूसी डिजाइन पर आधारित चार नई परमाणु इकाइयों का निर्माण चल रहा है, जबकि दो इकाइयां एक दशक से अधिक समय से व्यावसायिक रूप से बिजली पैदा कर रही हैं।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों के अनुसार कुडनकुलम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का एक अहम हिस्सा है, जिसका मकसद बढ़ती बिजली मांग को स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा स्रोतों से पूरा करना है।
रोसाटॉम ने क्या कहा?
जेएससी एटम-स्ट्रॉय-एक्सपोर्ट में भारत परियोजनाओं के निदेशक मिखाइल नोविकोव ने कहा कि कुडनकुलम परियोजना की सफलता का आधार भारत और रूस के बीच लंबे समय से चला आ रहा सहयोग है।
उन्होंने कहा कि इस समय भारतीय विशेषज्ञ रूसी डिजाइन पर आधारित चार नई परमाणु इकाइयों का निर्माण कर रहे हैं, जबकि दो अन्य इकाइयां पिछले दस वर्षों से अधिक समय से बिजली उत्पादन कर रही हैं। उनके मुताबिक यह दोनों देशों के बीच मजबूत साझेदारी और समन्वित कार्यशैली को दर्शाता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह परियोजना?
भारत तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है। कुडनकुलम परियोजना देश की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में से एक है, और इसके सभी प्रस्तावित रिएक्टरों के चालू हो जाने के बाद दक्षिण भारत की बिजली जरूरतों को पूरा करने में इसका अहम योगदान रहने की उम्मीद है।
परमाणु ऊर्जा, कोयले और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने तथा कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यूनिट-5 के रिएक्टर प्रेशर वेसल की सफल स्थापना इस परियोजना के निर्माण में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है, जिसके साथ ही परियोजना अपने अगले निर्माण चरण में दाखिल हो गई है। यह प्रगति भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ भारत-रूस रणनीतिक सहयोग को भी नई रफ्तार देगी।
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