लाख की चूड़ियां: न कोई मशीन, न फैक्ट्री—बस हाथ का हुनर और राजस्थान की सदियों पुरानी कारीगरी राजस्थान एक महीने पहले 47
कोटा के कारीगर आज भी पूरी तरह हाथों से लाख की चूड़ियां तैयार करते हैं, जो भारतीय महिलाओं के श्रृंगार और राजस्थान की हस्तशिल्प परंपरा की पहचान हैं।

भारतीय महिलाओं के श्रृंगार में लाख की चूड़ियों का स्थान आज भी खास बना हुआ है। खास बात यह है कि इन्हें किसी बड़ी मशीन या फैक्ट्री में नहीं, बल्कि कोटा के कारीगरों के कुशल हाथों से पारंपरिक ढंग से ही तैयार किया जाता है। यही हस्तकला इन चूड़ियों को बाकी आभूषणों से अलग और विशेष बनाती है।

पूरी तरह हाथों से होने वाली कारीगरी

इन चूड़ियों को बनाने की शुरुआत चापड़ी को गर्म करने से होती है। इसके बाद उसमें रंग मिलाया जाता है, फिर उसे आकार दिया जाता है और अंत में उस पर आकर्षक डिजाइन उकेरे जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता—हर चरण कारीगर अपने हाथों से ही पूरा करते हैं।

भट्ठी की तपिश के बीच जिंदा कला

तेज गर्मी और भट्ठियों की तपिश के बीच काम करते हुए ये कारीगर अपनी वर्षों पुरानी कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं। कठिन परिस्थितियों में भी उनका धैर्य और हुनर बरकरार है, जिसकी बदौलत यह परंपरागत शिल्प पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।

राजस्थान की हस्तशिल्प परंपरा की पहचान

कारीगरों की मेहनत और कौशल से तैयार होने वाली ये चूड़ियां सिर्फ महिलाओं की खूबसूरती ही नहीं बढ़ातीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा की पहचान भी मानी जाती हैं। यही कारण है कि लाख की चूड़ियों की चमक और इनके पीछे छिपा हुनर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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