राजस्थान
एक घंटा पहले
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विश्व नेत्रदान दिवस के मौके पर हाड़ौती क्षेत्र के अनेक चिकित्सकों ने मृत्यु के उपरांत भी समाज की सेवा करने का बीड़ा उठाते हुए नेत्रदान का संकल्प लिया। शाइन इंडिया फाउंडेशन की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने भावुक होकर कहा कि यदि उनके न रहने के बाद उनकी आंखें किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति के जीवन को रोशनी से भर सकें, तो इससे बड़ा परोपकार और कुछ नहीं हो सकता।
जीवन भर सेवा, अंत के बाद भी रोशनी देने का जज़्बा
हाड़ौती संभाग में बीते 15 वर्षों से नेत्रदान, अंगदान और देहदान के क्षेत्र में सक्रिय शाइन इंडिया फाउंडेशन ने इस अवसर पर चिकित्सकों को नेत्रदान के महत्व से अवगत कराया। इस दौरान कई वरिष्ठ डॉक्टरों ने कहा कि लोगों की सेवा करना आजीवन उनका कर्तव्य रहा है, और यदि उनके निधन के बाद उनकी आंखें किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की दुनिया को उजाला दे सकें, तो इससे बढ़कर सुकून और खुशी की बात नहीं हो सकती।
जागरूकता बढ़ाने पर ज़ोर
चिकित्सकों का कहना था कि नेत्रदान एक ऐसा पुण्य कार्य है, जो किसी की ज़िंदगी से अंधकार को मिटाकर उसे नई आशा और नया नज़रिया प्रदान करता है। उन्होंने माना कि समाज में नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस नेक अभियान का हिस्सा बन सकें।
संकल्प लेने वाले चिकित्सक
संकल्प पत्र भरने वालों में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल रहे। नेत्र सर्जन डॉ. सुधीर गुप्ता, डॉ. रधमेश मित्तल, डॉ. सुरेश छाबड़ा, डॉ. विशाल स्नेही और डॉ. अरनव सरोया के साथ ही महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. राजश्री गोहदकर एवं डॉ. लेख कंवर ने प्रण लिया।
इनके अलावा शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पुनीत गोस्वामी, आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. मुक्ति शर्मा व डॉ. नेहा आहुजा, होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. रिचा जैन व डॉ. विजेता गुप्ता, दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. भारती छाबड़ा व डॉ. ज्योति चौरसिया, टीबी एवं चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. मोतीलाल बुनकर तथा हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. निशांत सक्सेना ने भी इस संकल्प में भागीदारी निभाई।
समाज को मिला बड़ा संदेश
डॉक्टरों के इस संकल्प ने समाज को यह प्रेरणादायी संदेश दिया कि सेवा का दायरा केवल जीवनकाल तक सीमित नहीं होता। किसी व्यक्ति के निधन के बाद भी उसकी आंखें किसी दृष्टिबाधित के जीवन में प्रकाश ला सकती हैं। नेत्रदान मानवता की ऐसी महान पहल है, जो किसी के अंधकारमय जीवन को नई रोशनी और नई उम्मीद देती है। यही नेत्रदान की सच्ची भावना है, जो जीवन के बाद भी परोपकार का अवसर प्रदान करती है।
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