पश्चिम बंगाल
एक घंटा पहले
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विचारों
पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सबसे मुखर और विवादित चेहरों में गिने जाने वाले कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम के तेवर अब पूरी तरह नरम पड़ चुके हैं। कभी मंच से केंद्रीय एजेंसियों, चुनाव आयोग और बीजेपी को ललकारने वाले हकीम इन दिनों राजनीति में सिर्फ अपनी 'सुरक्षित विदाई' की गुहार लगाते नजर आ रहे हैं।
ममता बनर्जी के राजनीतिक किले में आई गहरी दरार और बीजेपी की बढ़ती ताकत के बीच फिरहाद हकीम ने चुपचाप कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया है। एक दिन पहले उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ देखा गया, जिसने राजनीतिक हलकों में सबको चौंका दिया।
बदले समीकरण और ढीले पड़े तेवर
राजनीतिक माहौल इस वक्त पूरी तरह बदला हुआ है। कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी सिपहसालार रहे फिरहाद हकीम का मेयर पद से इस्तीफा और शुभेंदु अधिकारी के साथ उनकी विधानसभा में मौजूदगी ने अटकलों को हवा दे दी है। माना जा रहा है कि टीएमसी में आई ऐतिहासिक टूट की आंच अब हकीम तक पहुंच चुकी है। अपने तीखे और विवादित बयानों के लिए मशहूर रहे यह नेता अब बीजेपी सरकार के दबाव के सामने खुद को बचाने की कोशिश में दिख रहे हैं।
जब दी थी पैर तोड़ने की धमकी
यह वही फिरहाद हकीम हैं, जिन्होंने मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया के दौरान बेहद उग्र और भड़काऊ बयान दिया था। उस वक्त उन्होंने मंच से कहा था कि बीजेपी और चुनाव आयोग आपस में मिलीभगत कर रहे हैं और अगर किसी असली मतदाता का नाम सूची से हटाया गया तो 'उनके पैर तोड़ दिए जाएंगे।'
इतना ही नहीं, अहंकार भरे लहजे में उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था कि जब तक ममता बनर्जी हैं, तब तक बीजेपी के बाप की औकात नहीं कि बंगाल में एनआरसी (NRC) लागू कर सके। उनके साथ टीएमसी के कुछ अन्य नेताओं ने भी बीजेपी कार्यकर्ताओं को जिंदा जलाने जैसी खौफनाक धमकियां दी थीं।
टीएमसी में महाटूट और हकीम की मजबूरी
समय का पहिया ऐसा घूमा कि जिस टीएमसी के बल पर फिरहाद हकीम आग उगलते थे, वही पार्टी आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टीएमसी के बागी गुट के नेता रिताब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनके पास 58 विधायकों का समर्थन है, जिसे विधानसभा अध्यक्ष की मंजूरी भी मिल चुकी है।
पार्टी में मची इस भगदड़ और कमजोर पड़ती पकड़ के बाद हकीम के सुर पूरी तरह बदल गए हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने भी स्वीकार किया कि फिरहाद हकीम ने ममता बनर्जी से इस्तीफे की अनुमति केवल इसलिए मांगी ताकि उन्हें एक सम्मानजनक विदाई मिल सके, क्योंकि सरकार के सामने नगर निगम अब पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका था।
शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के मायने
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा फिरहाद हकीम और शुभेंदु अधिकारी की मुलाकात को लेकर है। बताया जा रहा है कि हकीम सीधे नबान्न सभाघर पहुंचे, जहां उन्होंने शुभेंदु अधिकारी के साथ बैठक की। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के कड़े रुख और बंगाल में बदलते प्रशासनिक माहौल के बीच हकीम को यह आभास हो गया है कि उनके पुराने बयानों पर कानूनी शिकंजा कस सकता है। यही कारण है कि कल तक मंच से दहाड़ने वाला नेता आज इस्तीफा देकर अपनी राजनीतिक और निजी सुरक्षा की जुगत में जुटा है।
सुरक्षित ठिकाने की तलाश
पश्चिम बंगाल की जनता भी हैरान है कि जो नेता केंद्रीय बलों और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं को सरेआम चुनौती देता था, वह आज इतना बेबस क्यों नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के 58 विधायकों के टूटने के बाद ममता सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ गई है। ऐसे में हकीम जैसे विवादित चेहरों को समझ आ गया है कि अब सत्ता का संरक्षण समाप्त हो चुका है। यही वजह है कि वे अब शांत होकर राजनीति से किनारा करने या सत्ता पक्ष के साथ कोई पर्दे के पीछे का समझौता तलाशने की कोशिश में हैं, ताकि उनके पुराने विवादित बयानों को नजरअंदाज किया जा सके।
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