छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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विचारों
भारत में आलू एक बेहद लोकप्रिय फसल है जिसकी मांग साल भर बनी रहती है। आमतौर पर लोग ठंड के मौसम में आलू उगाते हैं, लेकिन पहाड़ी इलाकों में खरीफ सीजन यानी बरसात के मौसम में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। हालांकि, बरसात के मौसम में आलू उगाना उतना आसान नहीं होता क्योंकि इस समय फसल के खराब होने का खतरा अधिक रहता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ संजय यादव ने खरीफ के मौसम में आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए कुछ बेहद जरूरी और व्यावहारिक सुझाव साझा किए हैं। यदि किसान इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं बल्कि बंपर पैदावार भी हासिल कर सकते हैं।
सही जमीन का चुनाव और जल निकासी का महत्व
कृषि विशेषज्ञ संजय यादव के मुताबिक, खरीफ सीजन में आलू उगाने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम सही खेत का चयन करना है। चूंकि बरसात के मौसम में लगातार बारिश होती है, इसलिए पानी के जमाव से फसल पूरी तरह तबाह हो सकती है। विशेषज्ञ की सलाह है कि इस मौसम में हमेशा ढलान वाली जमीन का ही चयन करें जहां पानी रुकने की गुंजाइश न हो। जल निकासी की उत्तम व्यवस्था होना खरीफ आलू के लिए अनिवार्य है। यदि खेत में पानी जमा रहेगा, तो मिट्टी के भीतर मौजूद आलू के कंद सड़ने लगेंगे और कुछ ही दिनों में आपकी पूरी मेहनत और लागत पर पानी फिर जाएगा। इसलिए पहाड़ी या ऐसी ऊंची जमीनों का चुनाव करें जहां से अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके।
बीज का चुनाव और बुवाई का सही तरीका
आलू की खेती में बीज की गुणवत्ता और उसके लगाने के तरीके पर फसल की सफलता निर्भर करती है। संजय यादव ने बताया कि खरीफ सीजन में पहाड़ी क्षेत्रों में बुवाई करते समय बीज को काटकर लगाने की गलती बिल्कुल न करें। ठंड के दिनों में मैदानी या बलुई-कछारी इलाकों में भले ही काटकर बीज लगाया जाता है, लेकिन बरसात में कटे हुए बीज बहुत जल्दी सड़ जाते हैं। इसलिए खरीफ में हमेशा साबुत यानी पूरा कंद ही बोना चाहिए। बीज का वजन भी बहुत मायने रखता है। एक स्वस्थ फसल के लिए लगभग 30 से 35 ग्राम वजन वाले स्वस्थ और रोगमुक्त कंदों का ही चुनाव करना चाहिए। इससे पौधों का अंकुरण और विकास बहुत मजबूत होता है।
खेत की गहरी जुताई और तैयारी की तकनीक
फसलों की रोपाई से पहले खेत की मिट्टी को उसके अनुकूल बनाना बेहद जरूरी है। इसके लिए संजय यादव ने एक विशेष तरीका सुझाया है। बुवाई से पहले तेज धूप वाले दिनों में एमबी प्लाऊ की मदद से खेत की एक बार गहरी जुताई अवश्य करानी चाहिए। इससे नीचे की मिट्टी ऊपर आ जाती है और तेज धूप के संपर्क में आने के कारण मिट्टी में छिपे हुए हानिकारक कीट, उनके अंडे और हानिकारक फफूंद पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। यह प्राकृतिक रूप से फसल को रोगों से बचाने का बेहतरीन तरीका है। इसके बाद, बुवाई के ठीक पहले खेत की कई बार जुताई करके मिट्टी को पूरी तरह से भुरभुरी और हवादार बना लेना चाहिए।
मेड़ का आकार और सही दूरी का गणित
आलू की अच्छी बढ़त के लिए खेत में बनाई जाने वाली मेड़ों की बनावट बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि विशेषज्ञ के अनुसार, किसानों को मेड़ बनाते समय कुछ जरूरी मानकों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- प्रत्येक मेड़ की ऊंचाई जमीन की सतह से करीब 12 से 15 सेंटीमीटर के बीच होनी चाहिए।
- एक मेड़ से दूसरी मेड़ के बीच की दूरी लगभग 45 से 60 सेंटीमीटर के आसपास रखी जानी चाहिए।
मेड़ों की इस ऊंचाई और दूरी का फायदा यह होता है कि पौधों की जड़ों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है। इसके साथ ही, बाद में पौधों पर मिट्टी चढ़ाने का काम भी बेहद आसानी से पूरा हो जाता है।
प्रति एकड़ बीज की मात्रा और रोपाई की सही परिस्थितियां
खरीफ आलू की बुवाई में बीज की मात्रा को लेकर अक्सर किसान असमंजस में रहते हैं। इस पर विशेषज्ञ ने स्पष्ट किया है कि प्रति एकड़ खेत के लिए लगभग 8 क्विंटल तक बीज की आवश्यकता हो सकती है। बुवाई करते समय बीजों को रासायनिक या जैविक खाद के साथ मेड़ पर एक निश्चित और उचित दूरी पर लगाया जाता है। संजय यादव ने किसानों को विशेष हिदायत दी है कि रोपाई केवल तभी करें जब मौसम साफ हो और धूप खिली हो। यदि मिट्टी में बहुत अधिक गीलापन हो या लगातार बारिश हो रही हो, तो बुवाई को कुछ समय के लिए टाल देना चाहिए। भुरभुरी मिट्टी में ही रोपाई करना सबसे अधिक फायदेमंद रहता है।
खाद, पोषण प्रबंधन और मिट्टी चढ़ाना
आलू की भरपूर पैदावार के लिए मिट्टी की उर्वरता के हिसाब से खाद और पोषण का सटीक प्रबंधन करना जरूरी है। केवल रासायनिक खादों के भरोसे रहने के बजाय संतुलित पोषण देना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है:
- फसल के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा का उपयोग करें।
- मिट्टी की जांच के आधार पर आवश्यक माइक्रोन्यूट्रिएंट्स यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव करें।
- जैविक खाद का उपयोग मिट्टी की सेहत सुधारता है। विशेषज्ञ के अनुसार, प्रति एकड़ खेत में लगभग दो से ढाई टन एफआईएम या वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए।
इसके अलावा, आलू की फसल में सबसे महत्वपूर्ण काम पौधों पर मिट्टी चढ़ाना होता है। बुवाई के लगभग 25 से 30 दिन बीत जाने के बाद, जब पौधे थोड़े बड़े हो जाएं, तो उनकी जड़ों के पास अच्छी तरह से मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। इससे आलू के कंद सीधे धूप के संपर्क में नहीं आते, जिससे उनका रंग हरा नहीं पड़ता और कंदों का आकार भी बड़ा और सुंदर होता है। इन छोटी-छोटी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर किसान खरीफ सीजन में आलू की खेती से शानदार मुनाफा कमा सकते हैं।
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