मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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विचारों
मध्य प्रदेश का अद्भुत नवग्रह मंदिर
भारत में सूर्य पूजा का विशेष महत्व है और उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में एक ऐसा ही चमत्कारी मंदिर मौजूद है, जहां खगोल विज्ञान और प्राचीन वास्तुकला का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। कुंदा नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नवग्रह मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सूर्योदय की पहली किरण सीधे मंदिर के गर्भगृह में स्थित सूर्य देव की प्रतिमा को स्पर्श करती है। यह दृश्य बेहद विस्मयकारी होता है और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
गणितीय गणना और ज्योतिष का संगम
यह मंदिर लगभग 300 साल पुराना माना जाता है। इसकी बनावट पूरी तरह से ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों और सटीक गणितीय गणनाओं पर आधारित है। मंदिर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह काल चक्र को दर्शाता है। इसके निर्माण में सात दिनों, 12 राशियों, 12 महीनों और नौ ग्रहों की स्थिति का विशेष ध्यान रखा गया है। यही कारण है कि इस मंदिर को भारत के चुनिंदा और अद्वितीय नवग्रह मंदिरों में गिना जाता है। मंदिर की संरचना में 20 फीट नीचे धरातल पर सूर्य देव का दरबार स्थित है। गर्भगृह तक जाने के लिए सात सीढ़ियां बनाई गई हैं, जो सप्ताह के सात दिनों को दर्शाती हैं। वहीं, गर्भगृह तक पहुँचने के लिए 12 सीढ़ियां और बाहर निकलने के लिए 12 सीढ़ियां हैं, जो वर्ष के 12 महीनों और 12 राशियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
सूर्य किरण प्रवेश महोत्सव का रहस्य
आचार्य लोकेश जागीरदार के अनुसार, यह अद्भुत घटना तब घटित होती है जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते हैं और दक्षिणायन की शुरुआत होती है। आमतौर पर यह घटना 16 जुलाई से शुरू होती है। इस दौरान सूर्योदय की पहली किरण मंदिर के विशेष स्थापत्य मार्ग से गुजरती हुई सीधे गर्भगृह में स्थापित सूर्य चक्र और भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती है। इस विशेष खगोलीय घटना के अवसर पर यहां सूर्य किरण प्रवेश महोत्सव का आयोजन किया जाता है। हालांकि, यह दुर्लभ दृश्य साल के केवल कुछ ही महीनों तक दिखाई देता है, इसलिए श्रद्धालु इस समय का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
स्थापना और पौराणिक मान्यता
इस प्राचीन मंदिर के इतिहास के पीछे एक रोचक कथा जुड़ी है। कहा जाता है कि शेषप्पा नामक व्यक्ति को स्वप्न में मां बगलामुखी के दर्शन हुए थे, जिन्होंने उन्हें इस स्थान पर नवग्रह मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया था। मंदिर की वास्तुकला मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय शैली से प्रेरित है। इसके तीन मुख्य शिखर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। मंदिर की स्थापना पूरी तरह से ग्रह शांति के मंत्रों और शास्त्रोक्त विधियों के आधार पर की गई है। गर्भगृह में भगवान सूर्य मध्य में स्थित हैं, जबकि उनके सामने शनि देव, दाईं ओर गुरु और बाईं ओर मंगल ग्रह विराजमान हैं। सभी ग्रह अपने-अपने वाहनों, यंत्रों, रत्नों और अस्त्र-शस्त्रों के साथ प्रतिष्ठित हैं।
पीताम्बरी ग्रह शांति पीठ
इस मंदिर का एक अन्य नाम पीताम्बरी ग्रह शांति पीठ भी है, क्योंकि यहां नौ ग्रहों की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी की भी पूजा की जाती है। मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों से संबंधित कोई दोष या समस्या है, तो वह उस विशेष ग्रह से जुड़ी दान सामग्री की पोटली यहां अर्पित कर सकता है। ऐसा करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। अपनी इन्ही मान्यताओं और अनूठी संरचना के कारण यह स्थान आज भी लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है, जो हमें हमारी प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि की याद दिलाता है।
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