मध्य प्रदेश
12 घंटे पहले
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मध्य प्रदेश के खरगोन में आदिवासी अंचल के छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा का एक बेहतर और मजबूत केंद्र प्रदान करने के उद्देश्य से क्रांतिसूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। इस बड़े मकसद के साथ शुरू हुए इस संस्थान को अस्तित्व में आए करीब तीन साल का लंबा समय बीत चुका है। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद निराशाजनक है। तीन साल बाद भी इस विश्वविद्यालय को अपना स्थायी भवन नसीब नहीं हो सका है, जिसके कारण 5 जिलों के विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है।
एक कमरे में दो कक्षाएं: बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव
विश्वविद्यालय का उद्देश्य जितना बड़ा था, वर्तमान में छात्रों को मिलने वाली सुविधाएं उतनी ही सीमित हैं। वर्तमान में यह संस्थान एक अस्थायी भवन से संचालित हो रहा है। यहां जगह की भारी कमी है, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ही कमरे के बीच में केवल एक पर्दा लटकाकर दो-दो कक्षाएं एक साथ चलाई जा रही हैं।
इस अव्यवस्था के कारण छात्रों को पढ़ाई में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है:
- पर्दे के दोनों तरफ एक साथ कक्षाएं चलने से छात्रों का ध्यान भटकता है।
- एक तरफ के शिक्षक की आवाज दूसरी तरफ आसानी से जाती है, जिससे दोनों तरफ के विद्यार्थी परेशान होते हैं।
- सीमित स्थान होने के कारण कमरे में बैठने की जगह भी बहुत कम पड़ रही है।
उद्देश्य बड़ा, लेकिन जमीनी हकीकत अधूरी
इस आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के विकास और शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए इस विश्वविद्यालय की नींव रखी गई थी। प्रशासन का लक्ष्य इसे उच्च शिक्षा के एक मजबूत केंद्र के रूप में विकसित करना था, ताकि दूर-दराज के आदिवासी विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए बड़े शहरों का रुख न करना पड़े। हालांकि, स्थापना के तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी सुविधाओं के विस्तार को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
ऐसे में अब यह गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर इस विश्वविद्यालय के स्थायी भवन का निर्माण कब पूरा होगा और यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को बुनियादी सुविधाएं कब मिलेंगी?
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