एमपी का वह जैविक गांव, जहां कभी हर घर में बनती थी खाद, अब फैल रही रासायनिक खेती मध्य प्रदेश 3 महीने पहले 52
मध्यप्रदेश का मलगांव कभी पूरे प्रदेश में 'जैविक ग्राम' के रूप में पहचाना जाता था, लेकिन आज यहां एक भी खेत पूरी तरह जैविक नहीं बचा और किसान रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर निर्भर हो गए हैं।

मध्यप्रदेश का एक गांव, जो कभी पूरे प्रदेश में 'जैविक ग्राम' के नाम से मशहूर था और बाकी गांवों के लिए एक मिसाल बना हुआ था, आज पूरी तरह बदलते दौर से गुजर रहा है। यह वही गांव है जहां कभी हर घर में जैविक खाद तैयार होती थी और यहां का अनाज अपनी शुद्धता के कारण दूर-दूर तक भेजा जाता था।

लेकिन वक्त के साथ इस गांव की तस्वीर बदल गई है। जैविक खेती को बढ़ावा देने वाला यह गांव अब धीरे-धीरे रासायनिक खेती की ओर बढ़ चुका है। जहां कभी घर-घर में खाद बनाई जाती थी, वहां अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है और किसान रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों पर निर्भर होते जा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों की सोच और जीवनशैली में भी बड़ा परिवर्तन ले आया है।

रासायनिक दवाओं का सहारा लेने को मजबूर हुए किसान

मलगांव की हकीकत यह है कि आज यहां एक भी खेत पूरी तरह जैविक नहीं बचा है, जबकि करीब 20 साल पहले स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस दौर में पूरे गांव में जैविक खेती होती थी। मगर बदलते मौसम, जलवायु परिवर्तन और कीटों के बढ़ते हमलों ने किसानों को रासायनिक दवाओं का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया।

पूर्व सरपंच दुर्गाराम पटेल बताते हैं कि पहले पानी की समस्या बेहद गंभीर थी और कई कंपनियों के भ्रामक प्रचार ने भी किसानों को प्रभावित किया। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में किसानों को यह एहसास हुआ कि जैविक खेती आत्मनिर्भरता देती है, क्योंकि इसमें खाद खुद तैयार की जाती है और किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इसके बावजूद ज्यादा उत्पादन और जल्दी मुनाफा कमाने की चाह ने किसानों को रासायनिक खेती की ओर खींच लिया।

शुद्धता के लिए मशहूर रहा यहां का अनाज

वे बताते हैं कि साल 2003 के आसपास गांव में जैविक खेती का प्रयोग बेहद सफल रहा था। उस समय इस गांव को एक आदर्श जैविक ग्राम के रूप में विकसित किया गया, जिसमें जिला पंचायत के तत्कालीन सीईओ राजेश गुप्ता की भी अहम भूमिका रही। वहीं स्वर्गीय हुकुमचंद पटेल इस गांव के पहले किसान थे, जिन्होंने जैविक खेती की शुरुआत की और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित किया।

खंडवा निवासी लव जोशी बताते हैं कि उन्होंने इस गांव को शुरू से देखा है। पहले यहां हर घर में जैविक खाद बनती थी और सभी किसान जैविक तरीके से खेती करते थे। यहां का अनाज अपनी शुद्धता के लिए जाना जाता था और बाहर भी इसकी आपूर्ति होती थी।

अब किस ओर जाएगा गांव

आज यह गांव एक अहम मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ आधुनिक खेती और ज्यादा मुनाफे की दौड़ है, तो दूसरी ओर पुरानी जैविक परंपरा की यादें। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में किसान दोबारा जैविक खेती की ओर लौटते हैं या रासायनिक खेती का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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