धान की फसल में पत्तियों का रंग बदलना है खतरे का संकेत, किसान इस तरह करें बचाव भारत एक घंटा पहले 3
अगस्त के महीने में धान की फसल में खरपतवार और जिंक की कमी से होने वाले खैरा रोग का खतरा बढ़ जाता है, जिसे समय रहते नियंत्रित करना बहुत जरूरी है।

धान की खेती के लिए अगस्त का महीना है चुनौतीपूर्ण

अगस्त की शुरुआत होते ही धान के किसानों के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय शुरू हो जाता है। जिन किसानों ने धान की बुवाई सामान्य समय से थोड़ी देरी से की है, उनके खेतों में खरपतवार का प्रकोप तेजी से बढ़ने की आशंका बनी रहती है। खेत में अगर अवांछित घास अधिक मात्रा में पनपने लगे, तो धान के मुख्य पौधों को सूर्य की रोशनी, पानी और मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं। इससे न केवल पौधों की विकास दर धीमी पड़ जाती है, बल्कि भविष्य में होने वाला कुल उत्पादन भी काफी कम हो सकता है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के कृषि विभाग के प्रोफेसर आर.आर. सिंह का कहना है कि देरी से बोई गई धान की फसल के शुरुआती दौर में खरपतवार प्रबंधन करना अत्यंत आवश्यक है। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो खरपतवार धान के पौधों के साथ संसाधनों के लिए मुकाबला करने लगते हैं, जिससे फसल कमजोर हो जाती है।

खरपतवार नियंत्रण के लिए सही तरीका

प्रोफेसर आर.आर. सिंह के अनुसार, बुवाई के लगभग एक महीने की अवधि के भीतर खेत की स्थिति को देखते हुए खरपतवार पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके लिए किसान नॉमिनी गोल्ड का उपयोग कर सकते हैं। हालांकि, इसके इस्तेमाल के समय कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। छिड़काव हमेशा सही समय पर और कृषि विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई उचित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। इससे धान के खेत में उगने वाली कई प्रकार की हानिकारक घास को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलती है। विशेषज्ञों की यह भी सलाह है कि किसी भी खरपतवारनाशी का उपयोग करने से पहले उत्पाद के डिब्बे या पैकेट पर दिए गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें, ताकि फसल पर कोई विपरीत असर न पड़े।

खैरा रोग और जिंक की कमी से बचाव

अगस्त के महीने में धान की फसल को प्रभावित करने वाली एक और गंभीर समस्या खैरा रोग है। यह मुख्य रूप से मिट्टी में जिंक की कमी के कारण होता है। जब धान की फसल इस रोग की चपेट में आती है, तो इसकी पत्तियों का रंग बदलने लगता है। पत्तियां कत्थई या भूरे रंग की दिखाई देने लगती हैं और पौधे का विकास पूरी तरह से रुक सकता है। इस स्थिति के बारे में प्रोफेसर आर.आर. सिंह बताते हैं कि यदि खेत में ऐसे लक्षण दिखें, तो किसानों को तुरंत जिंक सल्फेट का उपयोग करना चाहिए। इसके लिए 5 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की मात्रा को 2 प्रतिशत यूरिया के घोल के साथ मिलाकर फसल पर छिड़काव करने से फसल को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

नियमित देखरेख है सफलता की कुंजी

धान की फसल के शुरुआती चरण को उसकी सफलता की नींव माना जाता है। किसानों को चाहिए कि वे नियमित अंतराल पर अपने खेतों की निगरानी करें और यदि पत्तियों में कोई असामान्य बदलाव या खरपतवार की वृद्धि दिखे, तो तुरंत किसी कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लें। समय रहते खरपतवारों का प्रबंधन करना और जिंक की कमी को दूर करना फसल की सेहत के लिए काफी लाभकारी सिद्ध होता है। सही समय पर की गई देखरेख न केवल पौधों की बढ़वार को बेहतर बनाए रखती है, बल्कि अंत में किसानों को अच्छी पैदावार प्राप्त करने में भी मदद करती है। सावधानी से की गई खेती ही किसानों को भारी नुकसान से बचा सकती है और बेहतर मुनाफा दिला सकती है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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