'बींदणी, तू सिर्फ पढ़, बाकी छोड़...' घर के काम पर डांटते थे ससुर, घूंघट की ओट में पढ़ बाड़मेर की बहू बनी सिविल जज करियर एक घंटा पहले 2
राजस्थान के बाड़मेर की बहू दीपू कंवर ने ससुराल के अनोखे सहयोग के बल पर घूंघट की ओट में पढ़ाई जारी रखी और तीसरे प्रयास में गुजरात न्यायिक सेवा परीक्षा में 79वीं रैंक हासिल कर सिविल जज बन गईं।

अगर ससुराल में बहू को बेटी जैसा भरोसा और साथ मिल जाए, तो वह सिर्फ घर ही नहीं संभालती, बल्कि कामयाबी की एक नई इबारत भी लिख सकती है। राजस्थान के बाड़मेर जिले की 'जज बहू' दीपू कंवर की कहानी इसी बात की जीती-जागती मिसाल है। गांव-देहात और परंपरागत माहौल में अक्सर शादी के बाद महिलाओं के सपने घूंघट की छांव में ही दम तोड़ देते हैं, लेकिन दीपू कंवर ने सालों तक चुपचाप अपनी पढ़ाई जारी रखी और आज वे एक सिविल जज के रूप में कोर्टरूम में कदम रख चुकी हैं।

दीपू की इस असाधारण कामयाबी के पीछे उनके ससुराल का वह अनूठा सहयोग है, जो आज के समाज के लिए बड़ी सीख है। जहां आमतौर पर बहुओं पर चूल्हा-चौका संभालने का दबाव रहता है, वहीं दीपू के घर का माहौल इसके बिल्कुल उलट था। यहां सास पढ़ाई करने को कहती थीं और घर का काम करते देख ससुर डांट लगा देते थे। परिवार ने तो बहू की पढ़ाई के लिए घर के एक कमरे को 'हॉस्टल का स्टडी रूम' तक बना दिया था। इसी अटूट भरोसे के दम पर दीपू कंवर ने गुजरात राज्य न्यायिक सेवा परीक्षा में पूरे देश में 79वीं रैंक पाकर रेगिस्तान का नाम रोशन कर दिया।

पति की प्रेरणा से बीकॉम के बाद चुनी कानून की राह

दीपू कंवर बचपन से ही पढ़ाई और खेल-कूद में होनहार रहीं और हमेशा से बड़ी अफसर बनने का सपना देखती थीं। जब उनकी सगाई हुई, उस समय वे बीकॉम की पढ़ाई कर रही थीं। उनके मंगेतर (अब पति) लोकेंद्र सिंह उस वक्त खुद एलएलबी कर रहे थे। लोकेंद्र ने दीपू के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें भी लॉ (LLB) करने के लिए प्रेरित किया। पति से मिले इसी हौसले के बाद दीपू ने गुजरात के जामनगर स्थित के.पी. शाह लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और वकालत की पढ़ाई पूरी की।

घर का काम करने पर मिलती थी ससुर की डांट

दीपू कंवर बताती हैं कि पढ़-लिखकर कुछ बनना खुद उनके सपने से ज्यादा उनके ससुराल वालों का सपना बन गया था। एक आदर्श बहू की तरह दीपू पढ़ाई के साथ-साथ गाय का दूध निकालना, खाना बनाना और घर के बाकी काम भी निपटाती थीं, लेकिन उनके ससुर को यह कतई पसंद नहीं था। जब भी वे दीपू को काम करते देखते, तो डांटते हुए कहते थे— 'घर के काम छोड़ो और पढ़ाई करके कुछ बनकर दिखाओ। पहले पढ़ाई, उसके बाद बाकी काम।' सास भी हमेशा यही समझाती थीं कि ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर रहे।

कमरे को बनाया हॉस्टल, बेटी से दूर रहकर दी परीक्षा

जज बनने का यह सफर आसान नहीं था, क्योंकि दीपू की एक छोटी बेटी भी थी। परिवार ने बहू की सुविधा के लिए घर के एक कमरे को पूरी तरह स्टडी रूम (हॉस्टल जैसा) में बदल दिया, जहां उन्हें कोई परेशान नहीं करता था। जब भी वे कॉलेज की परीक्षाएं देने जामनगर जातीं, तो उनकी नन्ही बेटी राजस्थान में दादा-दादी के पास ही रहती थी। एलएलबी सेकेंड ईयर की परीक्षा के समय वे सिर्फ 8 दिन ससुराल में रुकीं और बाकी समय पढ़ाई में जुटी रहीं, क्योंकि पूरा परिवार हर हाल में उनके हिसाब से तालमेल बैठा रहा था।

तीसरे प्रयास में चमकी किस्मत, बनीं सिविल जज

ससुराल से मिले इसी जादुई सहयोग की बदौलत दीपू कंवर के रास्ते में रुकावटें कम आईं। एलएलबी पूरी करने के बाद उन्होंने जामनगर कोर्ट में ही प्रैक्टिस शुरू कर दी। साल 2022 में उन्होंने पहली बार गुजरात न्यायिक सेवा (GJS) परीक्षा दी, जिसमें वे इंटरव्यू तक तो पहुंचीं, पर चयन नहीं हो सका। साल 2023 में दूसरे प्रयास में मेन्स में निराशा हाथ लगी, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार साल 2025 में उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने गुजरात स्टेट ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा में 79वीं रैंक हासिल कर जज की कुर्सी अपने नाम कर ली।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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