भारतीय सेना में मेजर और ब्रिगेडियर के पद में क्या है अंतर, जानिए सैलरी और प्रमोशन की पूरी जानकारी करियर एक दिन पहले 10
भारतीय सेना में मेजर और ब्रिगेडियर के पदों के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। यह लेख दोनों रैंक की जिम्मेदारियों, सैलरी स्ट्रक्चर, बैज की पहचान और प्रमोशन के नियमों का विस्तृत विवरण देता है।

भारतीय सेना में मेजर बनाम ब्रिगेडियर

भारतीय सेना में शामिल होने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि सैन्य पदों की संरचना कैसे काम करती है। सेना पूरी तरह से अनुशासन और नेतृत्व पर टिकी होती है, जहां हर रैंक की अपनी एक अलग अहमियत और जिम्मेदारी तय होती है। जब हम सेना के अधिकारियों की बात करते हैं, तो मेजर और ब्रिगेडियर दोनों ही बेहद प्रतिष्ठित पद माने जाते हैं। हालांकि, पदानुक्रम या रैंकिंग के नजरिए से देखा जाए तो ब्रिगेडियर का पद मेजर की तुलना में काफी सीनियर होता है। एक मेजर जहां मिड लेवल के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर होते हैं, वहीं ब्रिगेडियर को एक सीनियर फ्लैग रैंक अधिकारी माना जाता है।

जिम्मेदारी और कमांड में अंतर

मेजर और ब्रिगेडियर की जिम्मेदारियों में जमीन और आसमान का फर्क होता है। मेजर सीधे तौर पर ग्राउंड लेवल पर सैनिकों का नेतृत्व करते हैं और अभियानों को अंजाम देते हैं। आमतौर पर एक मेजर एक कंपनी की कमान संभालते हैं, जिसमें लगभग 100 से 120 सैनिक शामिल होते हैं। इसके विपरीत, एक ब्रिगेडियर पूरी ब्रिगेड का कमांडर होता है, जिसके तहत 3,000 से 3,500 सैनिक काम करते हैं। ब्रिगेडियर के अधीन कई कर्नल और मेजर स्तर के अधिकारी तैनात रहते हैं।

रैंक और बैज की पहचान कैसे करें

सेना की सीढ़ी में इन दोनों पदों का स्थान अलग-अलग है। मेजर से ऊपर लेफ्टिनेंट कर्नल और कर्नल होते हैं, जिसके बाद ब्रिगेडियर का नंबर आता है। इन्हें पहचानने का सबसे आसान तरीका इनके कंधे पर लगे बैज हैं। मेजर के कंधे पर केवल एक राष्ट्रीय प्रतीक यानी अशोक स्तंभ बना होता है, जबकि ब्रिगेडियर के कंधे पर अशोक स्तंभ के साथ-साथ त्रिभुज के आकार में तीन सितारे भी सजे होते हैं।

प्रमोशन की प्रक्रिया और समय सीमा

मेजर बनने की यात्रा एनडीए, सीडीएस, ओटीए या AFCAT जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए लेफ्टिनेंट के रूप में शुरू होती है। एक अधिकारी लगभग 6 साल की सेवा पूरी करने के बाद प्रमोट होकर मेजर बनता है। वहीं, ब्रिगेडियर तक पहुंचना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है। यह पद पूरी तरह से सिलेक्शन बोर्ड और मेरिट पर निर्भर करता है। एक अधिकारी को कर्नल रैंक से ब्रिगेडियर बनने के लिए लगभग 25 से 28 साल की शानदार और बेदाग सेवा देनी पड़ती है। जबकि मेजर का प्रमोशन अक्सर समय आधारित होता है, ब्रिगेडियर का पद केवल चयन के आधार पर ही मिलता है।

7th पे कमीशन के तहत सैलरी और सुविधाएं

दोनों रैंक के अधिकारियों के वेतन में भी बड़ा अंतर होता है। 7th CPC यानी सातवें वेतन आयोग के अनुसार इनके पे-मैट्रिक्स इस प्रकार हैं:

  • मेजर: इन्हें लेवल 11 के अंतर्गत रखा गया है, जहां इनकी बेसिक पे 69,400 रुपये से लेकर 2,07,200 रुपये तक होती है।
  • ब्रिगेडियर: ये लेवल 13A में आते हैं और इनका बेसिक पे 1,39,600 रुपये से लेकर 2,17,600 रुपये के बीच रहता है।

इसके अलावा, दोनों ही स्तर के अधिकारियों को 15,500 रुपये प्रति माह का फिक्स्ड मिलिट्री सर्विस पे यानी MSP मिलता है। मूल वेतन के अलावा, इन्हें महंगाई भत्ता, हार्डशिप अलाउंस, राशन की सुविधा, टाइप-V या टाइप-VI बंगला और आधिकारिक वाहन जैसी सुविधाएं भी दी जाती हैं। साथ ही, इन्हें कैंटीन की बेहतरीन सेवाएं भी प्राप्त होती हैं।

रिटायरमेंट और कार्यशैली

मेजर और ब्रिगेडियर की सेवानिवृत्ति की उम्र में भी अंतर है। यदि मेजर रैंक से ऊपर प्रमोशन न हो, तो वे लगभग 52 से 54 वर्ष की आयु में रिटायर हो जाते हैं, जबकि ब्रिगेडियर पद के अधिकारी 56 वर्ष की आयु तक सेवा देते हैं। इनकी कार्यशैली की बात करें तो मेजर का काम फील्ड में रहकर ऑपरेशन्स को लीड करना होता है, वहीं ब्रिगेडियर का काम पूरी तरह से रणनीतिक होता है। ब्रिगेडियर युद्ध की तैयारियों, बड़े सैन्य अभियानों की योजना बनाने और सामरिक फैसलों में अपनी भूमिका निभाते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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