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4 घंटे पहले
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संघर्ष और सफलता की अनोखी कहानी
सफलता कभी भी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, यह बात रांची के अंकित मिश्रा ने अपने जीवन से साबित कर दिखाई है। अंकित ने बहुत ही कम उम्र में वह मुकाम हासिल किया है जिसे पाने के लिए युवा सालों तक पसीना बहाते हैं। मात्र 23 साल की आयु में यूपीएससी की ओर से आयोजित सीएपीएफ (CAPF) परीक्षा में 236वीं रैंक हासिल कर उन्होंने क्लास-1 गजेटेड अफसर बनने का गौरव प्राप्त किया है। उनकी यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार के लिए बल्कि लाखों ऐसे युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों के अभाव में हार मान लेते हैं।
अपमान ने बदली अंकित की दिशा
अंकित मिश्रा का जीवन संघर्षों की एक लंबी गाथा जैसा है। उनके माता-पिता एक साधारण चाय का ठेला लगाते थे ताकि परिवार का पेट भर सके। समाज में कई बार आर्थिक तंगी को लेकर परिवार को उपेक्षा का सामना करना पड़ता था। उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट वह क्षण बना, जब एक रिश्तेदार ने सिर्फ इसलिए उन्हें और उनके माता-पिता को शादी में आमंत्रित नहीं किया क्योंकि वे चाय बेचते थे। इस अपमान ने अंकित के आत्मसम्मान को झकझोर दिया। उस दिन उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि वे समाज के इस संकीर्ण नजरिए को अपनी मेहनत और काबिलियत से बदलकर दम लेंगे। यह टीस ही उनके जीवन में सिविल सेवा की तैयारी के लिए सबसे बड़ा ईंधन साबित हुई।
कोविड के दौर में परिवार का सहारा बने अंकित
साल 2020 का दौर अंकित के परिवार के लिए बेहद कठिन था। कोरोना महामारी की मार और पिता की निजी नौकरी छूट जाने के कारण घर की आर्थिक स्थिति बदहाल हो गई थी। ऐसे समय में जब कई लोग हिम्मत हार जाते हैं, अंकित ने जिम्मेदारी को समझा। उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया ताकि परिवार का गुजारा हो सके। इतना ही नहीं, अपनी छोटी सी बचत से उन्होंने पिता को चाय का ठेला लगाने में भी पूरा सहयोग दिया। घर की जिम्मेदारियों का बोझ और भविष्य के सपने, अंकित ने इन दोनों के बीच बेहतरीन संतुलन बनाया।
पढ़ाई में मेधावी और अनुशासन के पक्के
अंकित का बचपन गरीबी के साए में बीता था। उनके पिता एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक थे और परिवार के पास अपना कोई पक्का मकान भी नहीं था। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद अंकित पढ़ाई में बेहद होनहार थे। 10वीं की कक्षा में उन्होंने जिले में टॉप किया था। जब वे हिंदी माध्यम से अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पहुंचे, तो वहां तालमेल बिठाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से 11वीं और 12वीं में शानदार अंक प्राप्त कर साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी संसाधन की मोहताज नहीं होती है।
दिल्ली में कड़ा संघर्ष और यूपीएससी का लक्ष्य
कॉलेज के दिनों में जहां उनके दोस्त मौज-मस्ती में समय बिताते थे, अंकित ने अपनी पूरी ऊर्जा अनुशासन और पढ़ाई में झोंक दी थी। उन्होंने दिल्ली जाकर अपनी तैयारी को और अधिक धार देने का फैसला किया। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने महंगे कोचिंग संस्थानों का सहारा लेने के बजाय पुराने नोट्स और सीमित पुस्तकों के जरिए अपनी रणनीति तैयार की। उनकी राह में मुश्किलें अनेक थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 2025 की सीएपीएफ परीक्षा में उन्होंने अपनी शारीरिक और मानसिक चुनौतियों को पार करते हुए सफलता का झंडा गाड़ दिया। हालांकि, पहले प्रयास में वे महज 7 अंकों के अंतर से अंतिम चयन से चूक गए थे, लेकिन उस असफलता ने उन्हें टूटने के बजाय और अधिक मजबूत बना दिया। आज अंकित मिश्रा की कहानी साबित करती है कि यदि इरादे पक्के हों, तो गरीब परिवार का बेटा भी देश का क्लास-1 अधिकारी बन सकता है।
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