झज्जर की 12 साल की दीक्षा का कमाल, बाइक से पूरी की कांवड़ यात्रा, बोली-दिल से साध्वी और कर्म से बनना है राइडर हरियाणा 2 घंटे पहले 3
हरियाणा के झज्जर जिले की सातवीं कक्षा की छात्रा दीक्षा ने हरिद्वार से अपनी कांवड़ यात्रा बाइक पर पूरी कर एक मिसाल पेश की है। उज्जैन में लिया गया उनका यह संकल्प अब पूरे सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

आस्था और जुनून का अनोखा संगम

हरियाणा के झज्जर जिले के बहु गांव की रहने वाली महज 12 साल की दीक्षा इन दिनों सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली दीक्षा ने अपनी धार्मिक आस्था और बाइक चलाने के शौक का एक अद्भुत तालमेल पेश किया है। उन्होंने हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपनी कांवड़ यात्रा को पूरा किया है। खास बात यह है कि उन्होंने यह पूरी यात्रा बाइक के माध्यम से की, लेकिन रास्ते के दौरान उन्होंने आधा सफर पैदल चलकर भी तय किया। दीक्षा का कहना है कि वे मन से साध्वी और कर्म से एक कुशल राइडर बनना चाहती हैं। उनके इसी अनोखे व्यक्तित्व ने हर किसी को प्रभावित किया है।

उज्जैन में लिया था संकल्प

दीक्षा के इस सफर की शुरुआत एक साल पहले हुई थी। वह करीब एक साल पहले उज्जैन गई थीं, जहां महाकालेश्वर के दर्शन के दौरान उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया था कि अगली बार वह हरिद्वार जाकर कांवड़ उठाएंगी। इस बार उन्होंने अपना यह वादा पूरा करके दिखाया। उन्होंने अपनी इस कांवड़ यात्रा के लिए विशेष तैयारी की थी। कांवड़ यात्रा के दौरान दीक्षा ने जो कुंडल, माला और वस्त्र धारण किए थे, वे सभी उन्होंने उज्जैन से ही खरीदे थे। धार्मिक श्रद्धा और साहसिक खेल का यह मिला-जुला रूप उनकी यात्रा को काफी खास बनाता है।

यात्रा का पूरा घटनाक्रम

दीक्षा की इस यात्रा का समयबद्ध विवरण भी काफी दिलचस्प है। वह 27 जुलाई को हरिद्वार पहुंच गई थीं। इसके बाद 3 अगस्त को शाम करीब 4 बजे उन्होंने विधि-विधान से गंगाजल उठाया और अपनी कांवड़ लेकर गांव की ओर प्रस्थान किया। उनके पिता टिंकू खेती करते हैं और उनकी माता एक गृहणी हैं। दीक्षा उनकी इकलौती संतान हैं। उनके पिता खुद भी पहले डाक कांवड़ ला चुके हैं, लेकिन अपनी बेटी की इस पहली कांवड़ यात्रा को लेकर वे बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं। उनके पिता का सपना है कि उनकी बेटी भविष्य में एक सफल राइडर बनकर नाम रोशन करे।

पिता की तमन्ना और सामाजिक सरोकार

दीक्षा के पिता टिंकू की दो प्रमुख इच्छाएं हैं। पहली यह कि उनकी बेटी एक निडर और सफल राइडर बने, जिससे वह समाज में अपनी एक अलग पहचान बना सके। दूसरी इच्छा उनके गांव से जुड़ी है, वे चाहते हैं कि उनके वर्तमान में बहु नाम से जाने जाने वाले गांव को उसके पुराने नाम भवनगढ़ के तौर पर पहचाना जाए। वहीं दूसरी ओर, दीक्षा खुद भी सामाजिक मुद्दों के प्रति बेहद जागरूक हैं। उनका मानना है कि गाय को राष्ट्र पशु का दर्जा मिलना चाहिए। वे पूर्णतः शाकाहारी हैं और जीवों के प्रति दया भाव रखने की वकालत करती हैं। उनका संदेश साफ है कि सभी को पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

सोशल मीडिया पर सराहना

दीक्षा की बाइक वाली कांवड़ यात्रा के वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। लोग न केवल उनकी धार्मिक निष्ठा की सराहना कर रहे हैं, बल्कि उनके राइडर बनने के जज्बे को भी सलाम कर रहे हैं। 12 साल की उम्र में ऐसा साहस और संकल्प कम ही देखने को मिलता है। धार्मिक आस्था, पिता का सपना, और एक युवा राइडर का जुनून जब आपस में मिलते हैं, तो दीक्षा जैसी कहानियाँ जन्म लेती हैं, जो आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती हैं। फिलहाल, अपनी यात्रा पूरी कर अपने गांव पहुंची दीक्षा अपने अगले सफर और राइडर बनने की तैयारियों में जुटी हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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