राष्ट्रीय राजनीति
51 मिनट पहले
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विचारों
जब कोई प्रधानमंत्री किसी दूसरे देश की संसद में भाषण देता है, तो उस पल का मतलब महज़ औपचारिकता या प्रोटोकॉल से कहीं आगे निकल जाता है। इसका अर्थ यह होता है कि मेज़बान देश सिर्फ़ भारत के नेता का स्वागत ही नहीं कर रहा, बल्कि अपने लोकतांत्रिक सदन में—कानून बनाने वालों, राजनयिकों, मीडिया और पूरी दुनिया के सामने—भारत की आवाज़ को भी जगह दे रहा है। ठीक यहीं नेहरू और मोदी के दौर का फ़र्क सामने आता है।
जवाहरलाल नेहरू ने अपने कार्यकाल के दौरान तीन विदेशी संसदों को संबोधित किया था। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से 2026 के बीच 19 विदेशी संसदों को संबोधित किया है, जो किसी भी भारतीय कार्यकारी प्रमुख के लिए सबसे बड़ा आँकड़ा है। मोदी 10 जून, 2026 को भारत के सबसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए और लगातार सेवा देने वाले प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ने के बेहद करीब हैं। ये भाषण इस बात का सबूत हैं कि भारत की वैश्विक आवाज़ पहचान बनाने की शुरुआती कोशिशों से आगे बढ़कर दुनिया की राजधानियों में एक व्यापक और आत्मविश्वास से भरी उपस्थिति तक पहुँच चुकी है।
अमेरिकी सांसदों के सामने नेहरू का संदेश
नेहरू ने 1949 में अमेरिकी सांसदों को संबोधित किया था, जब भारत-अमेरिका रिश्ते बिल्कुल शुरुआती दौर में थे। उस समय हाउस चैंबर की मरम्मत चल रही थी, इसलिए सीनेट जाने से पहले उन्होंने ‘वेज़ एंड मीन्स कमेटी रूम’ में आयोजित एक स्वागत समारोह में करीब 15 मिनट तक भाषण दिया। उस दौर में सीनेट की बैठक पुराने सुप्रीम कोर्ट चैंबर में हो रही थी, जहाँ उन्होंने वही भाषण दोबारा दिया।
उस समय राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन के नेतृत्व वाला वॉशिंगटन नेहरू की गुटनिरपेक्षता और समाजवादी सोच को समझने का प्रयास कर रहा था, जबकि शीत युद्ध के खेमों में तेज़ी से बँटती दुनिया के बीच भारत अपनी नई-नई मिली आज़ादी को बचाने में जुटा था। नेहरू का संदेश सतर्क लेकिन साफ़ था। उन्होंने कहा कि वे अमेरिका के “दिमाग और दिल” को “जानने-समझने की यात्रा” पर आए हैं और बदले में भारत का अपना “दिमाग और दिल” उसके सामने रखना चाहते हैं।
नेहरू ने तकनीकी और यांत्रिक सहयोग का स्वागत किया, मगर इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत सबसे पहले आत्मनिर्भरता पर भरोसा करेगा और अपनी “मुश्किल से हासिल की गई आज़ादी” के किसी भी हिस्से के बदले “कोई भौतिक फ़ायदा” नहीं चाहेगा। यह एक ऐसे नवस्वतंत्र देश की आवाज़ थी, जो निर्भरता के बिना सहयोग चाहता था।
मोदी ने कैसे बुलंद की भारत की आवाज़
विदेशी संसदों में मोदी के संबोधन भारत की वैश्विक यात्रा के एक बिल्कुल अलग पड़ाव का हिस्सा हैं। उनके भाषणों के ज़रिए भारत का संदेश पड़ोसी देशों, बड़े पश्चिमी लोकतंत्रों, अफ्रीका, कैरिबियन, इंडो-पैसिफिक और पश्चिम एशिया की संसदों तक पहुँचा है।
2014 में पद संभालने के तुरंत बाद मोदी ने भूटान, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया और फ़िजी की संसदों को संबोधित किया। 2015 में उन्होंने मॉरीशस की नेशनल असेंबली, श्रीलंका की संसद, मंगोलिया की संसद, यूके की संसद और अफ़गानिस्तान की संसद के सामने भाषण दिया। इसके बाद उन्होंने 2016 और फिर 2023 में अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित किया।
यह सूची आगे और लंबी होती गई—2018 में युगांडा, 2019 में मालदीव, 2024 में गुयाना, 2025 में घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, नामीबिया तथा इथियोपिया, और 2026 में इज़रायल की नेसेट (संसद)। नेसेट में दिया गया भाषण उनका हालिया संबोधन था, जहाँ मोदी को इज़रायली संसद के सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा गया।
अमेरिकी कांग्रेस में मोदी की बात
मोदी का 2016 का संबोधन नेहरू के 1949 के भाषण से एकदम भिन्न परिस्थितियों में हुआ। तब तक राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में भारत-अमेरिका रिश्ते एक मज़बूत रणनीतिक मुकाम तक पहुँच चुके थे; ओबामा अपने कार्यकाल में दो बार भारत आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे।
दोनों देशों के बीच कारोबार 2009 के $60 बिलियन से बढ़कर 2015 में $107 बिलियन हो गया था, अमेरिका से भारत की रक्षा खरीद $14 बिलियन तक पहुँच चुकी थी और अमेरिका में भारतीय एफडीआई तीन गुना हो गई थी। यही आत्मविश्वास मोदी की भाषा में भी दिखा। अटल बिहारी वाजपेयी के ‘हिचकिचाहट की छाया’ से बाहर आने के आह्वान का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका ने ‘इतिहास की हिचकिचाहटों’ को पीछे छोड़ दिया है। रिश्तों को परिभाषित करने के लिए उन्होंने ‘सहजता, स्पष्टता और तालमेल’ (Comfort, Candour and Convergence) जैसे शब्द चुने और कहा कि अमेरिकी कांग्रेस ने ‘बाधाओं को साझेदारी के पुलों में बदलने’ में मदद की है।
2023 में मोदी अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को दो बार संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बाद वे ऐसे दूसरे अंतरराष्ट्रीय नेता भी हैं जिन्हें एक से ज़्यादा बार यह सम्मान मिला। उनके 2023 के भाषण से साफ़ हुआ कि दुनिया में भारत की हैसियत कितनी बदल चुकी है। मोदी ने कहा कि जब वे पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में अमेरिका गए थे, तब भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और अब यह पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। उन्होंने कहा, ‘जब भारत आगे बढ़ता है, तो पूरी दुनिया आगे बढ़ती है।’
मोदी ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है—इस विचार के ज़रिए भारत के वैश्विक जुड़ाव को पेश किया। इसे भारत की जी20 थीम “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के साथ भारत का जुड़ाव सबके फ़ायदे के लिए है।
विदेशी संसदों के भाषण क्यों अहम हैं
दूसरे देशों की संसद में दिए गए भाषण भले ही प्रतीकात्मक हों, मगर कूटनीति में प्रतीकों का अपना वज़न होता है। ऐसे निमंत्रण तभी दिए जाते हैं जब कोई देश सम्मान जताना चाहता हो, राजनीतिक रिश्ते मज़बूत करना चाहता हो या आने वाले नेता के महत्व को मान्यता देना चाहता हो।
यही वजह है कि मोदी के 19 भाषण मायने रखते हैं। ये न सिर्फ़ व्यक्तिगत कूटनीति को दर्शाते हैं, बल्कि एक ऐसे देश के रूप में भारत की व्यापक स्वीकार्यता को भी सामने लाते हैं, जिसकी भूमिका अलग-अलग क्षेत्रों और मुद्दों पर अहम मानी जाती है।
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