मिट्टी के दीये बनाने वाली पीढ़ी का मोहभंग, विरासत बचाने की जद्दोजहद और बदलते समय की मार झारखंड एक घंटा पहले 6
जमशेदपुर के कुम्हार परिवारों की तीन पीढ़ियों की विरासत अब खतरे में है क्योंकि अगली पीढ़ी इस पारंपरिक पेशे से दूर हो रही है। कच्चे माल की बढ़ती महंगाई और मेहनत के मुकाबले कम कमाई इस कला के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है।

दीपावली की चमक के पीछे छिपी एक मायूस कहानी

जमशेदपुर के बाराद्वारी कुम्हारपाड़ा से आने वाली तस्वीरें बेहद सुकून देने वाली हैं। दीपावली के मौके पर हवा में गूंजती रेडियो की पुरानी धुनें, चाक पर तेजी से घूमती मिट्टी और कुशल हाथों से बनते मिट्टी के दीये, यह दृश्य किसी भी भारतीय त्योहार की असली पहचान है। हालांकि, इस खूबसूरती के पीछे एक गहरा दर्द भी छिपा है। जो हाथ दूसरों के घरों को अपनी कला से रोशन करते हैं, उन घरों में भविष्य को लेकर अंधेरा गहराता जा रहा है। हेमंत कुमार जैसे कारीगर जो पिछले 45 वर्षों से अपनी पुश्तैनी विरासत को संभाल रहे हैं, अब यह मान चुके हैं कि शायद उनके बाद इस काम को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं बचेगा।

तीन पीढ़ियों का समर्पण और चौथी पीढ़ी का मोहभंग

हेमंत कुमार बताते हैं कि उनके दादा और पिता ने जिस कला को सींचा था, उसे वे पिछले करीब 45 वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं। उनके लिए कुम्हारी सिर्फ पेट पालने का साधन नहीं है, बल्कि यह उनके पूर्वजों की निशानी है। घर में रेडियो के पुराने नगमे बजते रहते हैं और उसी संगीत की थाप पर वे मिट्टी को दीये, खिलौने और सजावटी सामानों का आकार देते हैं। लेकिन, हेमंत के चेहरे पर एक गहरी चिंता भी है। उनका परिवार दीपावली की तैयारियों में जुटा तो है, मगर चौथी पीढ़ी अब इस पुश्तैनी पेशे में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। युवा पीढ़ी अब निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख कर रही है। हेमंत को डर सता रहा है कि उनकी यह कला उनके साथ ही समाप्त न हो जाए।

बढ़ती महंगाई और मेहनत की कम कीमत

कुम्हार परिवारों के सामने सबसे बड़ी बाधा कच्चे माल की आसमान छूती कीमतें हैं। हेमंत के अनुसार, पहले जो मिट्टी उन्हें आसानी से मिल जाती थी, अब उसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती है। साथ ही दीये पकाने के लिए जरूरी कोयला और लकड़ी की कीमतों में भी भारी इजाफा हुआ है। संजय कुमार इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इस बार मिट्टी की खरीद पर होने वाला खर्च लगभग तीन गुना तक बढ़ गया है। मेहनत के अनुपात में बाजार से मिलने वाला दाम बहुत कम है, जिससे परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो गया है। आर्थिक तंगी ने युवाओं का इस काम से मन पूरी तरह हटा दिया है क्योंकि उन्हें इसमें भविष्य सुरक्षित नजर नहीं आता।

मौसम की मार ने बढ़ाई चुनौतियां

इस साल दीपावली से पहले मौसम भी कारीगरों के साथ खेल खेल रहा है। लगातार हो रही बारिश और बादलों के डेरा जमाए रखने से कच्ची मिट्टी के दीयों को सुखाना एक बड़ी चुनौती बन गई है। धूप न निकलने के कारण दीये ठीक से सूख नहीं पाते, जिसका सीधा असर उनके पकने की प्रक्रिया पर पड़ता है। यदि दीये अच्छी तरह नहीं पकते हैं, तो उनकी गुणवत्ता गिर जाती है और वे बाजार में बिकने लायक नहीं रहते। इस तरह की अनिश्चितताओं से कारीगरों को भारी आर्थिक नुकसान का डर सता रहा है। दिन-रात की मेहनत के बाद भी मौसम और बाजार की मार उनकी कमर तोड़ रही है।

महिलाओं का योगदान और परंपरा बचाने की जंग

इस विरासत को जीवित रखने में कुम्हार परिवारों की महिलाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पर्मिला देवी जैसी महिलाएं जो बचपन से ही मिट्टी के साथ खेलती और रंग भरती आई हैं, आज भी इस परंपरा को बचाने के लिए डटी हुई हैं। दिन-रात की कड़ी मेहनत करके वे दीयों को आकर्षक और सुंदर बनाने का काम करती हैं ताकि वे त्योहार के दिन लोगों के घरों में रोशनी बिखेर सकें। वे बताती हैं कि उन्होंने अपनी सास और मां से यह कला सीखी है। हालांकि, वे भी इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि आने वाली पीढ़ी इतनी मेहनत वाले काम को अपनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। कुम्हारपाड़ा के लोग अब यह सोचकर परेशान हैं कि अगर यह कला खत्म हो गई, तो दीपावली की वह पुरानी रूह और मिट्टी की सोंधी खुशबू कहां खो जाएगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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