खाकी का क्रूर चेहरा: मुख्यमंत्री के काफिले के लिए दो बहनों पर उड़ेल दिया खौलता पानी, कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति राजस्थान 2 महीने पहले 78
राजस्थान में वीआईपी सुरक्षा के नाम पर एक पुलिसकर्मी ने ठेला लगाने वाली दो बहनों पर खौलता हुआ पानी फेंक दिया, जिससे वे गंभीर रूप से झुलस गईं। प्रशासन ने आरोपी पुलिसकर्मी को केवल लाइन हाजिर कर पल्ला झाड़ लिया है, जो कि न्याय के नाम पर एक बड़ा मजाक है।

वीआईपी सुरक्षा के नाम पर बर्बरता का नंगा नाच

राजस्थान में एक ऐसी घटना सामने आई है जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल जाए। वीआईपी मूवमेंट के नाम पर पुलिस ने अपनी संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं। मुख्यमंत्री के काफिले को सुरक्षित निकालने के लिए एक पुलिसकर्मी ने सड़क किनारे ठेला लगाने वाली दो बहनों पर न केवल दबाव बनाया, बल्कि खौलता हुआ पानी उन पर उड़ेल दिया। यह पूरी घटना मानवता को शर्मसार करने वाली है। जब मामला मीडिया में छाया और लोगों का गुस्सा भड़का, तो प्रशासन ने डैमेज कंट्रोल करते हुए आरोपी पुलिसकर्मी नरेंद्र को लाइन हाजिर कर दिया। सवाल यह है कि क्या किसी को गंभीर रूप से घायल कर देने के बाद सजा के तौर पर केवल ड्यूटी से हटा देना पर्याप्त है?

क्या खाकी को मिला है कानून से ऊपर होने का लाइसेंस?

इस भीषण गर्मी में जब नल से निकलने वाला पानी भी असहनीय महसूस होता है, उस वक्त किसी के शरीर पर उबलता हुआ पानी डालना रूह कंपा देने वाला अनुभव है। उन बहनों ने पुलिस से केवल इतना ही कहा था कि बर्तन को नीचे उतारने के लिए उन्हें थोड़ा वक्त दिया जाए, ताकि कोई बड़ी दुर्घटना न हो। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की थी, लेकिन वीआईपी ड्यूटी के नशे में चूर उस पुलिसकर्मी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। उसने अपनी ताकत दिखाने के लिए ठेले को जोरदार धक्का दे दिया। उबलता हुआ पानी सीधे छोटी बहन रेशु के ऊपर जा गिरा। उसका हाथ, छाती, पेट और जांघ बुरी तरह झुलस गए। दर्द से कराहती वह बच्ची सड़क पर तड़पती रही, लेकिन सुरक्षा में तैनात पुलिस वालों की आंखों में शर्म की एक बूंद भी नहीं थी।

लाइन हाजिर बनाम असल सजा

प्रशासन ने आरोपी नरेंद्र को एपीओ यानी लाइन हाजिर कर दिया है। आम जनता को यह लग सकता है कि यह कोई सख्त कार्रवाई है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। राजस्थान पुलिस में लाइन हाजिर का अर्थ केवल एक थाने से हटाकर पुलिस लाइन में बैठा देना है। यह सजा नहीं, बल्कि एक तरह की सशुल्क छुट्टी है। वह पुलिसकर्मी अपनी पूरी सैलरी उठाएगा और जैसे ही मामला शांत होगा, उसे किसी दूसरे थाने में तैनात कर दिया जाएगा। क्या उस बच्ची की शारीरिक और मानसिक पीड़ा की कीमत सिर्फ एक ट्रांसफर है?

आम आदमी और पुलिस के लिए अलग-अलग कानून?

इस पूरे मामले को एक निष्पक्ष नजरिए से परखने की जरूरत है। यदि कोई आम आदमी किसी के ठेले को जानबूझकर धक्का देता और उसकी वजह से किसी लड़की पर खौलता पानी गिर जाता, तो क्या होता? पुलिस उस व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार करती और उस पर गैर-जमानती धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता। उस पर गंभीर चोट पहुंचाने, खतरनाक साधनों से नुकसान करने और हत्या के प्रयास जैसी धाराएं लगाई जातीं। वह शख्स जेल की सलाखों के पीछे होता और उसकी पूरी जिंदगी कानूनी दांव-पेच में उलझकर रह जाती। तो फिर इस पुलिसकर्मी के साथ इतनी रियायत क्यों बरती जा रही है? क्या पुलिस की वर्दी पहनने का मतलब यह है कि आप किसी को भी जिंदा जला देने का लाइसेंस पा चुके हैं?

कानून की किताब क्या कहती है

कानून किसी भी स्थिति में किसी को भी हिंसा करने की इजाजत नहीं देता। चाहे मुख्यमंत्री का काफिला हो या कोई और महत्वपूर्ण वीआईपी मूवमेंट, आम नागरिकों की सुरक्षा पुलिस की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सड़क पर ठेला लगाने वाली गरीब बच्चियों को खौलते पानी से जला देना किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है। इस मामले में पुलिस प्रशासन की चुप्पी और कमजोर कार्रवाई यह सवाल खड़े करती है कि क्या हम वास्तव में कानून के शासन में जी रहे हैं या फिर खाकीधारी अपनी मनमर्जी के मालिक हैं। पीड़ित परिवार के लिए न्याय का मतलब लाइन हाजिर नहीं, बल्कि उस पुलिसकर्मी के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत सख्त कार्रवाई और उसे जेल भेजना होना चाहिए। जब तक वर्दी का रौब कानून से ऊपर रहेगा, ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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