राजेश पायलट की 26वीं पुण्यतिथि : 'राम-राम सा...' के साथ पिता की राह पर मजबूती से बढ़ रहे सचिन राजस्थान 2 दिन पहले 9
पूर्व केन्द्रीय मंत्री और लोकप्रिय सांसद रहे राजेश पायलट की आज 26वीं पुण्यतिथि है। उनके बेटे सचिन पायलट ने पिता की राजनीतिक विरासत को न सिर्फ संभाला, बल्कि उसे नई ऊंचाइयां भी दीं।

आज पूर्व केन्द्रीय मंत्री और राजस्थान के लोकप्रिय सांसद रहे राजेश पायलट की 26वीं पुण्यतिथि है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले राजेश पायलट के आकस्मिक निधन के बाद उनके बेटे और कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने उनकी विरासत को पूरी कुशलता के साथ आगे बढ़ाया। इस मौके पर राजेश पायलट की कर्मस्थली दौसा में एक बड़ी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ, जिसमें पूरा पायलट खेमा एकजुट दिखा।

राजस्थान की राजनीति में ऐसे नेता बहुत कम हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत को न केवल बखूबी संभाला, बल्कि उसे और भी आगे बढ़ाते हुए पिता से लंबी लकीर खींच दी। इन्हीं चुनिंदा नामों में एक हैं सचिन पायलट। सहज, सरल और जमीनी जुड़ाव वाले नेता के रूप में पहचाने जाने वाले अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए सचिन ने इस विरासत को नए आयाम दिए हैं।

'राम-राम सा' का संबोधन आज भी छाया है

राजस्थान की सियासत में आज भी राजेश पायलट की जमीनी राजनीति की चर्चाएं होती हैं। उनका 'राम-राम सा' वाला संबोधन प्रदेश की राजनीति में आज भी जीवंत है। राजीव गांधी और उनके भाई संजय गांधी के करीबी रहे पायलट स्वभाव से भले ही सौम्य थे, लेकिन उन्होंने कई कड़े फैसले भी लिए जिनकी गूंज आज भी सियासी गलियारों में सुनाई देती है।

शह और मात के खेल में छा गए पिता-पुत्र

उत्तर प्रदेश की धरती से आकर मरुधरा को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले राजेश पायलट कभी दिल्ली के अकबर रोड स्थित बंगला नंबर 10 में दूध पहुंचाया करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने राजनीति में ऐसी उड़ान भरी कि हर कोई देखता रह गया। भारतीय वायुसेना के पायलट जैसे हाईप्रोफाइल पेशे को छोड़कर राजनीति में उतरे राजेश इस खेल में ऐसे छाए कि देखते ही देखते कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की कतार में शामिल हो गए।

पिता के निधन के बाद विरासत संभालने वाले सचिन भी छोटी उम्र में राजनीति में इस कदर उभरे कि राजस्थान के बड़े-बड़े कांग्रेस नेता उनके कद के सामने छोटे नजर आने लगे।

दोनों ने कभी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा

पिता राजेश पायलट की तरह सचिन भी समन्वय के साथ अपनी बात रखने में नहीं हिचकिचाते। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के पक्षधर रहे राजेश की तरह सचिन ने भी पूर्ववर्ती गहलोत सरकार (2018-23) के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए बगावत का झंडा तक बुलंद कर दिया था।

राजेश पायलट ने अपने हक के लिए कड़े फैसले जरूर लिए, मगर कभी पार्टी का दामन नहीं छोड़ा। सचिन की भी ठीक यही शैली है। पार्टी के भीतर तमाम विरोधाभासों के बावजूद उन्होंने कभी संगठन का साथ नहीं छोड़ा और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

पिता किसानों में, बेटा युवाओं में लोकप्रिय

सचिन भी पिता की तरह तेजी से उभरे और सियासी मैदान में मजबूत पहचान बनाई। जहां राजेश पायलट की किसान वर्ग में गहरी पैठ थी, वहीं सचिन युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और उनकी छवि एक 'क्राउड पुलर' नेता की है। चुनौतियां स्वीकार करने के शौकीन सचिन इस मामले में भी पिता जैसे ही हैं।

राजेश पायलट ने पहले भरतपुर और फिर दौसा से लोकसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की। उसी तरह सचिन को जहां भी चुनाव लड़ाया गया, उन्होंने वहां विजय हासिल की — चाहे वह गुर्जर बहुल दौसा लोकसभा क्षेत्र हो, अजमेर हो या टोंक विधानसभा क्षेत्र।

पिता की तरह तेज रफ्तार से आगे

पिता के निधन के बाद महज 26 साल की उम्र में सांसद बने सचिन 31 साल की उम्र में केंद्रीय मंत्री बन गए। पार्टी में तेजी से जड़ें जमाते हुए उन्होंने 36 साल की उम्र में प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली और 40 साल की उम्र में, 2018 में पार्टी के सत्ता में आने के बाद उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए।

हालांकि उनके मुख्यमंत्री बनने के पूरे आसार थे, लेकिन राजनीतिक समीकरणों के चलते यह कुर्सी उनके हाथ से खिसक गई। पिता के उसूलों को आदर्श मानकर राजनीति करने वाले सचिन आज भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, जिस रफ्तार से कभी उनके पिता राजेश पायलट बढ़े थे।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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