राजस्थान
4 घंटे पहले
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विचारों
कला और संस्कृति से गहराई से जुड़े शहर जयपुर में पेंटिंग, मूर्ति कला और दूसरी कलाओं को आज भी लोग दिल खोलकर सराहते हैं। यही वजह है कि देश के अलग-अलग राज्यों के कलाकार अपनी कला लेकर यहां पहुंचते रहते हैं। इन्हीं दिनों जयपुर के जवाहर कला केंद्र में स्वदेशी शिल्प उत्सव चल रहा है, जहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के कलाकार अपनी रचनाएं लेकर आए हैं। इनमें बिहार के मधुबनी से आए कलाकार अपनी मशहूर मधुबनी पेंटिंग्स के साथ मौजूद हैं, जिनकी जयपुर में जबरदस्त मांग देखी जा रही है।
50 साल से कला से जुड़े हैं कमलेश प्रजापति
उत्सव में मधुबनी पेंटिंग लेकर आए कलाकार कमलेश प्रजापति बताते हैं कि इस कला का इतिहास बरसों पुराना है और वे खुद 50 वर्षों से इससे जुड़े हुए हैं। वे कई तरह की पेंटिंग तैयार करते हैं, जिनमें गोधरा पेंटिंग, लाइट पेंटिंग और मिथिला पेंटिंग शामिल हैं। ये सभी मधुबनी आर्ट के अंतर्गत ही बनाई जाती हैं।
कमलेश के मुताबिक वे अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं, जो इस कला से जुड़कर काम कर रही है। उनका कहना है कि लोग इन पेंटिंग्स को घरों में सजाने के लिए खूब खरीदते हैं। मधुबनी पेंटिंग को घर में लगाना शुभ माना जाता है, क्योंकि इनमें भगवान की लीलाओं का चित्रण होता है।
लाखों रुपये में बिकती हैं पेंटिंग्स
कमलेश प्रजापति बताते हैं कि मधुबनी पेंटिंग कला विश्व प्रसिद्ध है और यह सिर्फ बिहार में ही तैयार होती है। हर कलाकार न तो इसे बना सकता है और न ही इसकी नकल कर सकता है। जयपुर में इन पेंटिंग्स की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां लोग 12 से 15 लाख रुपये कीमत तक की पेंटिंग खरीदते हैं। इसके साथ ही कम बजट वाली पेंटिंग्स की भी अच्छी-खासी मांग बनी रहती है।
उनके अनुसार सामान्य मधुबनी पेंटिंग की कीमत 10 से 15 हजार रुपये होती है, जबकि सबसे कम कीमत 3 हजार रुपये है। इससे कम दाम में कोई पेंटिंग तैयार नहीं की जाती। उन्होंने बताया कि मधुबनी पेंटिंग में ज्यादातर भगवान राम-सीता, राधा-कृष्ण, हनुमानजी और जगन्नाथ पुरी जैसी धार्मिक कलाकृतियां बनाई जाती हैं, यही वजह है कि लोग इन्हें दूसरी पेंटिंग्स के मुकाबले सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
कैसे तैयार होती है मधुबनी पेंटिंग
कमलेश प्रजापति बताते हैं कि इस कला को आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है। पुराने समय में मधुबनी पेंटिंग गांव की मिट्टी और गोबर से लिपी झोपड़ियों की दीवारों पर बनाई जाती थी, लेकिन अब यह हस्तनिर्मित कागज और कपड़े पर बनाई जाती है। मोटे कागज पर बनने वाली इन पेंटिंग्स में लाल, पीला, हरा, नीला और काला जैसे प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है।
पेंटिंग बनाने से पहले पेंसिल से एक हल्का खाका तैयार किया जाता है। इसके बाद पारंपरिक तरीके से बांस की तीलियों, माचिस की तीलियों या रुई के फाहे से ब्रश बनाकर सबसे पहले गहरी काली या भूरी रेखाएं खींची जाती हैं। रूपरेखा बन जाने के बाद उसमें रंग भरे जाते हैं और फिर किनारों पर बेहद आकर्षक और घने बॉर्डर बनाए जाते हैं। इन बॉर्डर में ज्यामितीय पैटर्न, फूल, पत्तियां और बेल-बूटों से खास सजावट की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही एक मधुबनी पेंटिंग पूरी तरह तैयार होती है।
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