दशहरा 2026: रावण बनाने के लिए प्याज-लहसुन से दूरी बना लेता है यह मुस्लिम परिवार, पांच पीढ़ियों से जयपुर में कायम है परंपरा राजस्थान एक घंटा पहले 3
जयपुर के आदर्श नगर में मथुरा का एक मुस्लिम परिवार पिछले पांच दशक से अधिक समय से 120 फीट ऊंचे रावण का पुतला बनाकर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश कर रहा है। पुतला निर्माण के दौरान यह पूरा परिवार सात्विक जीवनशैली अपनाता है और पूर्णतः शाकाहारी रहता है।

जयपुर की परंपरा और गंगा-जमुनी संस्कृति

राजस्थान की राजधानी जयपुर में दशहरे का त्योहार इस साल भी एक खास चर्चा के साथ सुर्खियों में है। शहर के आदर्श नगर इलाके में इन दिनों रावण के एक विशालकाय पुतले को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस पुतले की भव्यता तो लोगों को आकर्षित करती ही है, लेकिन उससे भी ज्यादा चर्चा इसे बनाने वाले कारीगरों की है। मथुरा का एक मुस्लिम परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से इस जिम्मेदारी को निभा रहा है, जो आपसी भाईचारे और सामाजिक समरसता की एक अद्भुत मिसाल है।

साठ साल पुराना सफर और पुतले का बढ़ता कद

इस अनूठी परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए कारीगर चांद बाबू बताते हैं कि उनके परिवार का जयपुर से नाता करीब 60 साल पुराना है। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके परिवार ने जयपुर में मात्र 20 फीट ऊंचा रावण बनाने का काम शुरू किया था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस कला की भव्यता और रावण के पुतले का आकार भी बढ़ता चला गया। इस साल यह परिवार 120 फीट ऊंचा रावण तैयार कर रहा है। रावण के साथ-साथ इस बार कुंभकर्ण का पुतला भी विशेष रूप से बनाया जा रहा है।

25 सदस्यों की टीम और पुरानी यादें

चांद बाबू के अनुसार, पुतला निर्माण के लिए उनके परिवार के कुल 25 सदस्य दिन-रात मेहनत करते हैं। उनके पिता लखो भाई, जिन्हें स्थानीय लोग प्यार और सम्मान से 'रावण वाले भाई' के नाम से बुलाते हैं, महज छह साल की उम्र में अपने दादा के साथ पहली बार जयपुर आए थे। उन दिनों मंदिर प्रन्यास द्वारा दशहरा मेला शुरू किया गया था। तब 20 फीट ऊंचा रावण बनाने के एवज में उन्हें 250 रुपए मेहनताना और 10 रुपए का इनाम मिलता था। आज समय बदल चुका है और इस साल 120 फीट ऊंचे रावण के लिए एक लाख रुपए का मेहनताना तय किया गया है।

पुतला बनाने में इस्तेमाल की गई सामग्री

इतने विशाल ढांचे को खड़ा करने के लिए भारी मात्रा में सामान जुटाया जाता है। इस बार रावण को तैयार करने में निम्नलिखित सामग्री का उपयोग हुआ है:

  • 600 बांस
  • पांच क्विंटल मैदा
  • तीन क्विंटल खाकी कागज
  • 200 किलो जेवड़ी
  • 200 किलो सफेद रद्दी
  • 150 किलो रस्सी
  • 35 किलो धागे

रावण के मुकुट और हथियारों को इस बार विशेष लाइटिंग के जरिए आकर्षक बनाया गया है। पुतले के विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग तैयार किया जा रहा है, जिन्हें बाद में क्रेन की सहायता से मुख्य मैदान में ले जाकर एक साथ जोड़ दिया जाएगा।

सात्विक जीवनशैली का पालन

इस परंपरा का सबसे भावनात्मक पहलू परिवार की जीवनशैली है। चांद बाबू ने बताया कि जब तक पुतला बनाने का काम चलता है, परिवार के सदस्य करीब डेढ़ महीने तक मंदिर परिसर में ही निवास करते हैं। इस पूरे समय वे पूरी तरह सात्विक जीवन जीते हैं। उनके चूल्हे पर प्याज, लहसुन और मांस-मदिरा का प्रयोग वर्जित होता है। सुबह और शाम जब मंदिर में आरती होती है, तो परिवार के सभी सदस्य अपनी जगह पर हाथ जोड़कर भक्तिभाव से खड़े हो जाते हैं। रामायण की रामलीला देखते-देखते परिवार की अगली पीढ़ी को भी अब रामायण की चौपाइयां और श्लोक कंठस्थ हो गए हैं।

भाईचारे की मिसाल

नवरात्रि के नौ दिनों में पूरा परिवार एक धार्मिक माहौल में रहकर इस काम को अंजाम देता है। दशहरे के दिन रावण दहन के तीन दिन बाद यह परिवार वापस अपने शहर मथुरा लौट जाता है। जयपुर में इस मुस्लिम परिवार द्वारा निभाई जा रही यह परंपरा न केवल शहर बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। यह संदेश देता है कि आस्था और परंपराएं किसी धर्म की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि वे मानवीय जुड़ाव और आपसी प्रेम का प्रतीक होती हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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