राष्ट्रीय राजनीति
5 घंटे पहले
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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से एक महत्वपूर्ण बयान सामने आया है, जहां देश के जाने-माने पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने संपूर्ण 'वंदे मातरम' का गायन करने का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने राष्ट्रगीत का विरोध करने वालों और इस पर धार्मिक विवाद खड़ा करने वालों को कड़ा जवाब दिया है। गीतांजलि अंगमो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'वंदे मातरम' गाने पर केवल इस आधार पर आपत्ति जताना कि इसके कुछ छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है, बेहद बचकानी सोच को दर्शाता है। उनका मानना है कि भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक धरोहरों को कभी भी मजहब या धार्मिक पहचान के संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
धार्मिक चश्मे से कला और साहित्य को देखना गलत: गीतांजलि अंगमो
समाचार एजेंसी आईएएनएस से खास बातचीत करते हुए गीतांजलि अंगमो ने इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम को लेकर समाज के कुछ हिस्सों में कई तरह की रुकावटें या आपत्तियां खड़ी की जाती हैं। सबसे पहले तो लोग यह तर्क देते हैं कि जब यह गीत लिखा गया था, तब भारत एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य भी नहीं था, तो यह पूरे भारत का गीत कैसे हो सकता है? इसके बाद, विरोधी यह दलील देते हैं कि इसके बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, तो भला दूसरे धर्मों को मानने वाले लोग इसे कैसे गा सकते हैं? मेरी नजर में यह इस महान गीत को देखने का बेहद ही अपरिपक्व और बचकाना तरीका है।'
अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए उन्होंने संगीत और साहित्य का एक बेहतरीन उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब हम सूफी कविताएं पढ़ते हैं या कोई खूबसूरत गजल सीखते हैं, तो हम उसे उर्दू भाषा में सीखते हैं और पूरे चाव से गाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि अगर कोई हिंदू व्यक्ति सूफी कलाम या गजल गाएगा तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा या उसकी अपनी धार्मिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी। इसी तरह कला को किसी एक धर्म के दायरे में नहीं बांधा जा सकता।
संस्कृत और सांस्कृतिक प्रतीकों का राजनीतिकरण अनुचित
गीतांजलि अंगमो ने भारत के प्राचीन इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे वेद और उपनिषद करीब 10 हजार साल पुराने ग्रंथ हैं, जो संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। उन्होंने कहा, 'अगर हम इटालियन ओपेरा सीखते हैं, तो वह मूल रूप से लैटिन भाषा में होता है। अगर हमें उसे सीखना है, तो हमें उसी भाषा का इस्तेमाल करना पड़ता है। हम उस भाषा और कला का जश्न मनाते हैं, न कि उसे धर्म से जोड़ते हैं।'
उन्होंने आगे कहा कि जब हम गायत्री मंत्र का जाप करते हैं या योगाभ्यास करते हैं, जिसमें कई संस्कृत श्लोक शामिल होते हैं, तो संस्कृत भाषा को केवल हिंदू धर्म या किसी खास राजनीतिक दल के साथ जोड़ना पूरी तरह से गलत है। संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध भाषाओं में से एक है। ये उच्च मंत्र और श्लोक हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और हमें जीवन की तमाम मुश्किलों से और अधिक मजबूती के साथ लड़ने की प्रेरणा देते हैं।
समस्याओं से भागना नहीं, बल्कि उनसे लड़ना सिखाता है वंदे मातरम
गीत की प्रासंगिकता पर बात करते हुए गीतांजलि ने उन लोगों को भी घेरा जो देश की अन्य समस्याओं का हवाला देकर वंदे मातरम की उपयोगिता पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा, 'यह तर्क देना कि जब देश के सामने दूसरी इतनी बड़ी समस्याएं हैं, तो वंदे मातरम पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है, बिल्कुल भी सही नजरिया नहीं है। वंदे मातरम देश की दूसरी समस्याओं के खिलाफ खड़ा नहीं है। इसके विपरीत, वंदे मातरम एक ऐसी ऊर्जावान भावना है जो देशवासियों के भीतर एक नया जज्बा भरती है ताकि वे एकजुट होकर उन सभी समस्याओं के खिलाफ लड़ सकें।'
उन्होंने गीत में वर्णित देवी-देवताओं के संदर्भ को भी स्पष्ट किया। उनके अनुसार, राष्ट्रगीत में हिंदू देवी-देवताओं के नाम केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उनके गहरे प्रतीकात्मक मायने हैं। उन्होंने समझाया:
- मां दुर्गा को शक्ति और साहस के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।
- मां लक्ष्मी को समृद्धि, संपन्नता और प्रचुरता के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
इसलिए, यदि किसी को इस गीत के गायन से कोई आपत्ति है, तो भी वे इसकी मूल संरचना को बदल नहीं सकते। उन्होंने बताया कि वंदे मातरम गीत बहुत लंबा था, इसलिए इसके पहले दो छंदों को राष्ट्रगीत के रूप में चुना गया था। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि गीत के बाकी हिस्सों को स्वीकार नहीं किया गया था। आप किसी भी कालजयी और ऐतिहासिक कलाकृति को अपनी सुविधा के अनुसार काट-छांट नहीं सकते हैं।
भारत केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, एक जीवंत सभ्यता है
पश्चिमी देशों और भारत की अवधारणा के बीच के अंतर को रेखांकित करते हुए गीतांजलि अंगमो ने कहा कि भारत की पहचान यूरोपियन देशों से पूरी तरह अलग है। उन्होंने कहा, 'हम अपने देश को महज जमीन का एक टुकड़ा, कोई राजनीतिक इकाई या केवल एक भौगोलिक सीमा के तौर पर नहीं देखते हैं। साल 1600 के दशक के बाद दुनिया के नक्शे पर कई नए देशों का उदय हुआ। लेकिन उससे पहले से ही भारत एक महान सभ्यतागत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित था। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण तक, और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, इस देश का हर नागरिक सदियों से यही सवाल पूछता आया है कि आखिरी सच्चाई क्या है? यही आध्यात्मिक जिज्ञासा और खोज भारत की असली पहचान रही है।'
उन्होंने आगे कहा कि भारत को 'माता' कहकर पुकारना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। वंदे मातरम हमें इसी गौरवशाली अहसास से जोड़ता है। उन्होंने पूछा कि आखिर आप अपनी मां यानी अपनी मातृभूमि से कैसे जुड़ेंगे? हमारा शारीरिक जन्म भी एक मां के माध्यम से होता है और हमारा पूरा पालन-पोषण भी धरती मां के जरिए ही होता है।
गीतांजलि ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि इस महान गीत को लालकिले से गाए जाने में इतना लंबा वक्त लग गया। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रगीत के रूप में यह हमेशा से हमारे देश की चेतना में मौजूद था, लेकिन लोगों की यादों से यह धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा था। आजादी मिलने के बाद लालकिले की प्राचीर से इसे गाए जाने में पूरे 80 साल का समय लग गया, और मुझे लगता है कि अब ऐसा होना एक बेहद स्वागत योग्य और जरूरी कदम है।'
बंकिम चंद्र चटर्जी केवल उपन्यासकार नहीं, बल्कि एक ऋषि थे
महान विचारक और दार्शनिक श्री अरबिंदो के विचारों का उल्लेख करते हुए गीतांजलि ने कहा कि जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में वंदे मातरम की रचना की थी, तब वे केवल एक सामान्य लेखक या उपन्यासकार की भूमिका में नहीं थे। श्री अरबिंदो के शब्दों में, बंकिम चंद्र चटर्जी वास्तव में एक 'ऋषि' थे। ऋषि वे द्रष्टा होते हैं जो भविष्य को और सत्य को देख सकते हैं। उन्होंने इस पावन भूमि को केवल एक बेजान मिट्टी या भौतिक भू-भाग के तौर पर नहीं देखा, बल्कि उसे 'शक्ति' और एक साक्षात जीवित सत्ता के रूप में महसूस किया।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा, 'यह मां एक जीती-जागती सत्ता है, जिसके साथ हर देशवासी अपना एक सीधा और आत्मीय रिश्ता बना सकता है। इसीलिए इस गीत को देश के कोने-कोने तक पहुंचने में 80 साल का लंबा समय नहीं लगना चाहिए था। शायद अगर हमारे भीतर देश को एक जीवित मां के रूप में देखने की यह गहरी समझ और राष्ट्रीय चेतना पहले से मजबूत होती, तो आज हमें भारत के दर्दनाक बंटवारे की विभीषिका का सामना नहीं करना पड़ता।'
विवाद के पीछे आम नागरिक नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा है
गीतांजलि अंगमो का मानना है कि वंदे मातरम को लेकर जो भी असहमति या विवाद दिखाई देते हैं, वे आम नागरिकों के बीच उतने गहरे नहीं हैं जितने कि वे राजनीतिक बहसों और चर्चाओं में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। उन्होंने कहा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि देश के आम लोगों के बीच वंदे मातरम को लेकर कोई बड़ी समस्या या द्वेष नहीं है। यह समस्या मुख्य रूप से राजनीतिक एजेंडे के कारण पैदा की जाती है। कई बार राजनीतिक दल और राजनेता अपने निजी स्वार्थों और एजेंडे को साधने के लिए समाज में बंटवारे वाली और ध्रुवीकरण की सोच को जानबूझकर बढ़ावा देते हैं।'
उन्होंने याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम महज एक गीत नहीं था, बल्कि वह देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले क्रांतिकारियों का एक सबसे बड़ा और जोश से भर देने वाला नारा बन गया था। इस नारे ने लाखों भारतीयों को एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दी थी। इसलिए आज केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण की वजह से कोई भी इस गीत की महत्ता को नकार नहीं सकता है, बल्कि हम सभी को इसे पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करना होगा।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन है सर्वधर्म समभाव का सबसे बड़ा उदाहरण
भारत की महान समन्वयी संस्कृति का जिक्र करते हुए गीतांजलि ने कहा कि हमारे देश का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है और हमने हमेशा अपनी मूल परंपराओं को जीवित रखते हुए बाहरी संस्कृतियों के अच्छे प्रभावों को खुले दिल से अपनाया है। उन्होंने कहा, 'भारत ने सदियों से दुनिया भर से आने वाले प्रभावों को अपने भीतर समाहित किया है। चाहे वह मुगल काल का प्रभाव हो या कोई अन्य विदेशी सांस्कृतिक प्रभाव, भारत ने हमेशा उन्हें अपनाया और आत्मसात किया है। लेकिन दूसरों के प्रभाव को अपनाने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि हमें अपनी खुद की उस गौरवशाली संस्कृति और विरासत को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने में कोई शर्म या संकोच महसूस हो, जो पिछले 10,000 से अधिक वर्षों से इस पावन भूमि पर जीवंत है। हमें दूसरों को स्थान देने के लिए खुद को छोटा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।'
उन्होंने भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का एक प्रेरक उदाहरण देते हुए समझाया। उन्होंने कहा कि डॉ. कलाम एक ऐसे महान व्यक्तित्व थे जिन्होंने भारतीय चिंतन और दर्शन की विभिन्न धाराओं को गहराई से समझा और अपनाया था। वे नियमित रूप से उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता और श्री अरबिंदो की महान रचनाओं का अध्ययन करते थे।
उन्होंने आगे कहा, 'मैं स्वयं बड़े चाव से सूफी कविताएं पढ़ती हूं। इससे किसी का भी धर्म दूषित या कमजोर होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। अगर कोई हिंदू व्यक्ति उर्दू भाषा सीखता है या कोई मुसलमान संस्कृत के श्लोक बोलता है, तो इससे उनका धर्म अपवित्र नहीं हो जाता। बल्कि, यही वह खूबसूरती है जो हमें एक-दूसरे की अच्छी बातों को सीखने और उनका सम्मान करने की प्रेरणा देती है।'
सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर ही भारत बनेगा महान
अंत में वंदे मातरम का अपने शब्दों में अर्थ समझाते हुए गीतांजलि अंगमो ने कहा कि इस पावन शब्द का सीधा और सच्चा अर्थ यही है - 'हे मां, मैं तुम्हें नमन करती हूं।' उन्होंने कहा कि हजारों सालों से हमारे पूर्वजों ने इस पावन भूमि को केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं माना, बल्कि उसे सदैव अपनी पूजनीय मां के रूप में देखा और सम्मान दिया है। इसलिए, हम चाहकर भी अपनी इस महान और पवित्र भावना को कभी नहीं छोड़ सकते।
उन्होंने अपनी बात को समाप्त करते हुए कहा कि भारत को भविष्य में भी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पूरी ताकत से सहेज कर रखना होगा। इसके साथ ही देश को खुले विचारों वाला और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला एक समावेशी राष्ट्र बने रहना चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमारा दिल इतना विशाल होना चाहिए कि हम दुनिया की तमाम अच्छी चीजों को अपने भीतर समा सकें, लेकिन इसके साथ ही हमें अपनी जीवन-शक्ति, अपनी मूल संस्कृति और अपनी अनमोल विरासत को भी हर हाल में जिंदा रखना होगा। केवल यही अनूठा मेल भारत को विश्व पटल पर एक महान और गौरवशाली देश बना सकता है।'
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