राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
भारत और चीन के बीच संबंधों को सुधारने की कवायद
गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से ही भारत और चीन के बीच कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर तनाव की स्थिति बनी रही है। हालांकि, अब दोनों पड़ोसी देश अपने द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं। इस प्रक्रिया का मुख्य केंद्र बिंदु वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर शांति और स्थिरता कायम करना है। इसी उद्देश्य के साथ नई दिल्ली में सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए बने तंत्र यानी WMCC की 36वीं बैठक आयोजित की गई। इस बातचीत के दौरान भारत ने चीन के सामने अपनी चिंताएं खुलकर रखीं और साफ कर दिया कि सीमा पर शांति के बिना रिश्तों में सुधार की उम्मीद करना कठिन है। भारत ने जोर देकर कहा कि दोनों देशों को सीमा प्रबंधन के लिए बने संस्थागत तंत्रों का प्रभावी उपयोग करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी तरह की गलतफहमी से बचा जा सके।
ब्रह्मपुत्र नदी का मुद्दा और भारत की मांग
WMCC की इस बैठक में सीमा विवाद के अलावा सीमा पार से बहने वाली नदियों का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण बनकर उभरा। भारत ने चीन से ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी हिस्से यानी अपस्ट्रीम में चलाई जा रही विशाल जलविद्युत परियोजनाओं के बारे में तकनीकी जानकारी साझा करने की स्पष्ट मांग की है। तिब्बत में बहने वाली यार्लुंग सांगपो नदी, जो आगे चलकर भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है, पर चीन एक बेहद खर्चीली परियोजना पर काम कर रहा है। भारत का स्पष्ट रुख है कि इस प्रकार के बड़े प्रोजेक्ट्स के बारे में पड़ोसी देशों को पारदर्शिता बरतनी चाहिए। भारत ने विशेषज्ञ स्तर के तंत्र की बैठक जल्द से जल्द आयोजित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया ताकि नदी के जल प्रवाह और उससे जुड़े अन्य सुरक्षात्मक पहलुओं पर चर्चा की जा सके।
137 अरब डॉलर की परियोजना और चीन का मेगा प्लान
चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाई जा रही यह परियोजना पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस विशाल जलविद्युत परियोजना की अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। चीन का दावा है कि यह परियोजना उसके वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े थ्री गॉर्जेज बांध के मुकाबले लगभग तीन गुना अधिक बिजली पैदा करने में सक्षम होगी। भारत के लिए यह प्रोजेक्ट केवल एक तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि तिब्बती पठार जैसे अत्यंत संवेदनशील और नाजुक पारिस्थितिक क्षेत्र में इतने बड़े स्तर पर निर्माण कार्य करने से पर्यावरण पर गंभीर और दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
भारत के लिए चिंता के प्रमुख कारण
भारत ने इस परियोजना को लेकर अपनी आशंकाएं दोहराई हैं। सबसे बड़ी चिंता नदी के प्राकृतिक प्रवाह में होने वाले बदलाव को लेकर है। यदि नदी का प्रवाह बाधित या परिवर्तित होता है, तो इसका सीधा असर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम राज्य में रहने वाली विशाल जनसंख्या पर पड़ेगा। इसके अलावा, बांग्लादेश जैसे निचले धारा वाले देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। भारत लगातार चीन से यह अपील करता रहा है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स को शुरू करने से पहले या दौरान संबंधित देशों के साथ पर्याप्त परामर्श किया जाए। भारत का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं में पारदर्शिता का अभाव न केवल पारिस्थितिकी के लिए खतरा है, बल्कि यह क्षेत्र के जल सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है।
WMCC बैठक का विवरण और कूटनीतिक पहल
नई दिल्ली में आयोजित इस उच्च स्तरीय वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के पूर्वी एशिया मामलों के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया। दूसरी ओर, चीन के प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व उनके विदेश मंत्रालय के सीमा एवं समुद्री मामलों के विभाग की महानिदेशक होउ यांकी ने किया। बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने LAC पर वर्तमान स्थिति की व्यापक समीक्षा की। पिछले साल सीमा विवाद के समाधान के लिए विशेष प्रतिनिधियों के बीच हुई 24वें दौर की वार्ता के परिणामों को आधार मानते हुए, दोनों देशों ने सीमा निर्धारण, प्रबंधन और सहयोग बढ़ाने से जुड़े बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की। वार्ता के दौरान दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि सीमा क्षेत्रों में तनाव को कम करने और स्थिरता बनाए रखने के लिए सैन्य और कूटनीतिक तंत्रों का उपयोग जारी रखना अनिवार्य है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
भारत की तरफ से यह संदेश बेहद कड़ा और स्पष्ट है कि सीमा पर शांति ही द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की पहली शर्त है। साल 2020 में हुए सैन्य गतिरोध के बाद से दोनों देश संबंधों को एक सामान्य स्थिति में वापस लाने के लिए कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि, ब्रह्मपुत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चीन की चुप्पी या असहयोग इस प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी चिंताओं को लगातार उठाता रहेगा और उम्मीद करता है कि चीन इन परियोजनाओं की तकनीकी जानकारी साझा करेगा ताकि क्षेत्र में एक विश्वास का वातावरण बन सके। सीमा प्रबंधन और सीमा पार सहयोग के लिए विशेषज्ञ स्तर की आगामी बैठकें ही यह तय करेंगी कि क्या चीन वाकई भारत के साथ अपने संबंधों को एक नई और सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए गंभीर है या नहीं।
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