ग्रेट निकोबार विकास परियोजना: समुद्री शक्ति और आर्थिक सपनों को मिलेगा नया आधार भारत एक घंटा पहले 2
ग्रेट निकोबार द्वीप को सामरिक और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट बनाए जाएंगे। सरकार का दावा है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती देने के साथ भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में नई पहचान दिलाएगी।

केंद्र सरकार ने ग्रेट निकोबार द्वीप को देश के अग्रणी सामरिक और आर्थिक ठिकानों में बदलने की एक बड़ी योजना का खाका तैयार किया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और नौसेना एयर स्टेशन, आधुनिक सुविधाओं से लैस टाउनशिप तथा पावर प्लांट खड़े किए जाएंगे। सरकार का आकलन है कि यह पहल जहां एक ओर देश की सुरक्षा को मजबूत करेगी, वहीं दूसरी ओर भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर एक नई पहचान भी दिलाएगी।

विदेशी बंदरगाहों पर घटेगी निर्भरता

ग्रेट निकोबार द्वीप की सबसे बड़ी खूबी इसका रणनीतिक स्थान है। यह द्वीप सिक्स डिग्री चैनल से सिर्फ 40 किलोमीटर दूर है, जिस मार्ग से दुनिया का करीब दो-तिहाई तेल और आधा कंटेनर यातायात गुजरता है। ऐसे में यहां बनने वाला अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत की विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करेगा और देश को एक वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब के तौर पर स्थापित करने में मददगार साबित होगा।

संचालन भारतीय नौसेना के अधीन

परियोजना में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का संचालन नियंत्रण भारतीय नौसेना के हाथ में रहेगा। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में देश की निगरानी क्षमता, समुद्री सुरक्षा और आपदा राहत कार्यों की प्रभावशीलता में बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही यह एयरपोर्ट पर्यटन को भी गति देगा। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2040 तक यह एयरपोर्ट हर साल 13.5 लाख यात्रियों को संभालने में सक्षम होगा।

'गालाथिया बे' को माना गया सबसे उपयुक्त

सरकार के अनुसार, परियोजना के लिए स्थल तय करने से पहले पांच संभावित जगहों का गहन अध्ययन किया गया था। तकनीकी, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं की पड़ताल के बाद गालाथिया बे को इसके लिए सबसे मुफीद स्थान पाया गया। मौजूदा INS Baaz एयरबेस को विस्तार देने का विकल्प भी विचार में आया, लेकिन भौगोलिक और तकनीकी अड़चनों के चलते इसे व्यावहारिक नहीं माना गया।

पर्यावरणीय प्रभावों का भी हुआ आकलन

पर्यावरण से जुड़ी आशंकाओं को देखते हुए परियोजना का विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन कराया गया। अध्ययन में सामने आया कि द्वीप के कुल क्षेत्रफल का बहुत सीमित हिस्सा ही विकास कार्यों में लगेगा, जबकि 81 प्रतिशत से अधिक इलाका राष्ट्रीय उद्यान, बायोस्फीयर रिजर्व, वन और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा सरकार ने वन्यजीव संरक्षण, कोरल संरक्षण और मैंग्रोव पुनर्स्थापन के लिए 30 वर्षों में 2,220 करोड़ रुपये से अधिक की विशेष योजना भी बनाई है।

जनजातीय समुदायों का नहीं होगा विस्थापन

जनजातीय अधिकारों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच प्रशासन ने साफ किया है कि किसी भी जनजातीय समुदाय का भौतिक विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। परियोजना से जुड़े तमाम फैसले कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए और संबंधित जनजातीय संस्थाओं से सलाह-मशविरे के बाद ही लिए गए हैं।

रोजगार के खुलेंगे नए द्वार

रोजगार के लिहाज से भी यह परियोजना अहम मानी जा रही है। अनुमान है कि इसके निर्माण और संचालन के दौरान एक लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पर्यटन, परिवहन, निर्माण, होटल और सेवा क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों के व्यापक स्तर पर बढ़ने की संभावना है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार विकास परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। वहीं पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन किस हद तक कायम रखा जाता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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