एक्सप्लेनर: 'हम दो हमारा एक' की सोच पड़ रही भारी, भारत में पहली बार रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे फिसली जन्मदर; जापान जैसी बूढ़ी आबादी का संकट करीब! भारत एक घंटा पहले 2
देश के इतिहास में पहली बार भारत की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ गई है। दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होते हुए भी घटती जन्मदर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी क्यों चिंता का सबब बन रही है, समझिए।

भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब देश की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे फिसल गई है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के बाद भी भारत में घटती जन्मदर को लेकर इतनी फिक्र क्यों जताई जा रही है। क्या वाकई भारत भी जापान की राह पर चलते हुए बूढ़ा होता जा रहा है?

दुनिया में इस समय 819 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं, जिनमें से 145 करोड़ अकेले भारत में हैं। यानी धरती का हर छठा व्यक्ति भारतीय है। आबादी के मामले में भारत अब चीन को भी पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद अमेरिका में बैठे दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क भारत की घटती आबादी को लेकर चिंता जता रहे हैं। मस्क ने एक पोस्ट में लिखा कि भारत में इतिहास में पहली बार जन्मदर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ गई है। दरअसल, जन्मदर घटने का सीधा असर यह होता है कि बच्चे कम और बुजुर्ग ज्यादा हो जाते हैं, और दूसरा असर देश की कुल आबादी में गिरावट के रूप में सामने आता है। मस्क की चिंता भी इसी को लेकर है।

आखिर 'रिप्लेसमेंट लेवल' होता क्या है?

किसी देश में एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में औसतन जितने बच्चों को जन्म देती है, उसे उस देश की कुल प्रजनन दर कहते हैं। जब औसतन एक महिला 2.1 बच्चों को जन्म दे, तो इसे सामान्य 'रिप्लेसमेंट लेवल' माना जाता है। इसका अर्थ है कि बच्चे आगे चलकर अपने माता-पिता की जगह ले लेंगे यानी उन्हें रिप्लेस कर देंगे। यदि प्रजनन दर 2.1 से ऊपर हो तो इसे जनसंख्या वृद्धि माना जाता है, और अगर यह इससे नीचे चली जाए तो यह संकेत होता है कि देश में पर्याप्त बच्चे जन्म नहीं ले रहे। यानी ऐसी स्थिति में जन्म लेने वालों की तुलना में मरने वालों की संख्या बढ़ने लगती है।

पहली बार रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे प्रजनन दर

भारत में महज एक दशक के भीतर प्रजनन दर में तेज गिरावट आई है और यह 2.1 यानी रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे आ चुकी है। मस्क इसी ओर ध्यान दिला रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो 1950 में भारत की प्रजनन दर 5.7 थी, यानी उस समय 1000 महिलाएं 5700 बच्चों को जन्म देती थीं। 1960 में यह बढ़कर 5.9 हुई, फिर 1970 में 5.6, 1980 में 4.8, 1990 में 4.0, 2000 में 3.4, 2010 में 2.6, 2020 में 2.1, 2023 में 2.0 और 2024 में घटकर 1.9 रह गई। इसका मतलब है कि अब 1000 महिलाएं सिर्फ 1940 बच्चों को जन्म दे रही हैं।

'हम दो हमारा एक' का फॉर्मूला बढ़ा रहा मुश्किल

गौर करने वाली बात यह है कि मस्क सिर्फ भारत की घटती आबादी पर ही नहीं, बल्कि दिल्ली, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों की ओर भी इशारा कर रहे हैं, जहां सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोग रहते हैं और जहां प्रजनन दर यूरोपीय देशों से भी कम हो चुकी है। दिल्ली और केरल जैसे राज्यों में 'हम दो हमारा एक' का चलन तेजी से इस समस्या को गहरा कर रहा है। दिल्ली की प्रजनन दर 1.2 है, जबकि फिनलैंड की 1.3 है। आंध्र प्रदेश की प्रजनन दर 1.4 है, जबकि फ्रांस की 1.68। इसी तरह केरल की प्रजनन दर 1.3 है, जबकि ब्रिटेन की 1.48 है।

इन 5 राज्यों में अब भी ज्यादा है प्रजनन दर

हालांकि देश में अब सिर्फ 5 राज्य ऐसे बचे हैं, जहां प्रजनन दर सामान्य से अधिक है, यानी यहां महिलाएं औसतन 2 से ज्यादा बच्चों को जन्म दे रही हैं।

  • पहले नंबर पर बिहार है, जहां प्रजनन दर 3.0 है।
  • दूसरे नंबर पर मेघालय है, जहां यह दर 2.91 है।
  • तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहां प्रजनन दर 2.35 है।
  • चौथे नंबर पर झारखंड है, जहां यह 2.26 है।
  • पांचवें स्थान पर मणिपुर है, जहां प्रजनन दर 2.17 है।

गरीबों के मुकाबले अमीरों में काफी कम प्रजनन दर

प्रजनन दर का सीधा संबंध शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ा होता है। 2015-16 के NFHS-4 के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। इनमें साफ दिखता है कि कम आय वाले लोगों में प्रजनन दर 3.2 है, जबकि अमीर वर्ग में यह सिर्फ 1.5 है। इसी तरह सामान्य वर्ग की प्रजनन दर 1.9, पिछड़े वर्ग की 2.2, अनुसूचित जाति की 2.3, अनुसूचित जनजाति की 2.5 और मुस्लिमों की 2.6 है। घटती फर्टिलिटी रेट का नतीजा यह होता है कि बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ने लगती है।

2050 तक भारत की 20.8 फीसदी आबादी होगी बुजुर्ग

2023 में जारी संयुक्त राष्ट्र की इंडिया एजिंग रिपोर्ट भी इसी रुझान की ओर इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2050 तक भारत की कुल आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 20.8 फीसदी हो जाएगी। यहां बुजुर्ग से तात्पर्य उन लोगों से है जिनकी उम्र 60 साल या उससे अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि 2010 के बाद से देश में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिसके चलते 15 साल से कम उम्र के लोगों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है।

सदी के अंत तक 36% होगी बुजुर्ग आबादी

रिपोर्ट के अनुसार, 1 जुलाई 2022 तक देश में बुजुर्गों की आबादी 14.9 करोड़ थी और कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी 10.5 फीसदी थी। लेकिन 2050 तक यह आंकड़ा बढ़कर 34.7 करोड़ तक पहुंच सकता है। ऐसा होने पर उस समय भारत की कुल जनसंख्या में 20.8 प्रतिशत बुजुर्ग होंगे, जबकि इस शताब्दी के खत्म होते-होते देश की 36 प्रतिशत से ज्यादा आबादी बुजुर्गों की होगी।

बुजुर्गों की आबादी में 134 फीसदी का उछाल

इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2022 से 2050 के बीच भारत की कुल आबादी 18 प्रतिशत बढ़ेगी, जबकि इसी दौरान बुजुर्गों की संख्या में 134 फीसदी का इजाफा होगा। वहीं 80 साल से अधिक उम्र वालों की आबादी 279 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। बच्चों की जरूरत को लेकर बहस सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, यह मुद्दा अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और चीन में भी छाया हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी बच्चों को लेकर राजनीति कर रहे हैं। जापान में बच्चे लगातार घट रहे हैं और बुजुर्ग बढ़ते जा रहे हैं, जहां अब 100 साल जीना आम बात बन चुकी है।

जापान में अभी ही एक-तिहाई आबादी 65 पार

जापान में इस समय करीब एक-तिहाई लोग 65 साल से ज्यादा उम्र के हैं। वहां औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़कर 84 वर्ष हो गई है। जापान में 100 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 1 लाख तक पहुंच चुकी है। वहां प्रजनन दर गिरकर 1.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई है। हालत यह है कि एक साल में जितने बच्चे जन्म ले रहे हैं, उससे ज्यादा लोग मर रहे हैं।

GDP का 6% खर्च करके भी नहीं बढ़ी प्रजनन दर

यूरोप में सोशल प्रोटेक्शन कानून लागू है, जहां हर नागरिक की देखभाल सरकारी खर्च पर होती है। फिर भी वहां के लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। हंगरी ने 2001 में अपनी GDP का करीब 6 प्रतिशत हिस्सा प्रजनन दर बढ़ाने वाली योजनाओं पर खर्च करना शुरू किया था। इसके चलते 2020 तक वहां की प्रजनन दर 1.23 से बढ़कर 1.61 तक पहुंच गई, लेकिन 2024 में यह फिर गिरकर 1.39 पर आ गई।

चीन को मजबूरी में बंद करनी पड़ी 'वन चाइल्ड पॉलिसी'

उधर चीन में भी जनसंख्या संकट 2022 में और गहरा गया, क्योंकि 1961 के बाद पहली बार जन्मदर में तेज गिरावट के कारण आबादी घटती दर्ज की गई। चीन में काम करने वाले लोगों की संख्या तेजी से घट रही है और बुजुर्गों की तादाद बढ़ती जा रही है। बढ़ती बुजुर्ग आबादी से चिंतित होकर चीन ने 2015 में एक बच्चे की नीति समाप्त कर दो बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी। अब वहां की सरकार बच्चे पैदा करने पर लोगों को पैसे भी देती है।

3 बच्चों की छूट के बाद भी नहीं बढ़ रही आबादी

दरअसल चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने 1979 में 'वन चाइल्ड' पॉलिसी लागू की थी, जिसे 2015 में खत्म कर दिया गया। इसके बाद लोगों को दो बच्चे पैदा करने की इजाजत मिली, लेकिन इससे जन्मदर नहीं बढ़ी। 2021 में सरकार ने 3 बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी, फिर भी चीन की आबादी घट रही है। 2025 में चीन की जनसंख्या 33 लाख 90 हजार घट गई। अमेरिका और यूरोप से लेकर जापान और चीन तक, हर देश इस चुनौती का हल तलाश रहा है।

आंध्र प्रदेश में बच्चे पैदा करने पर इनाम वाली स्कीम

भारत की बात करें तो आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए नई योजना लेकर आए हैं। इसके तहत दूसरा बच्चा पैदा करने पर 25 हजार रुपये, तीसरा बच्चा होने पर 30 हजार और चौथा बच्चा होने पर 40 हजार रुपये दिए जाएंगे। इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह राज्य का गिरता हुआ टोटल फर्टिलिटी रेट है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश का TFR इस समय घटकर करीब 1.4 पर पहुंच गया है। आबादी को स्थिर रखने के लिए रिप्लेसमेंट लेवल TFR का 2.1 होना बेहद जरूरी माना जाता है। इसका मतलब है कि राज्य की आबादी अब तेजी से घटने की कगार पर है।

2047 तक आंध्र में 23 प्रतिशत होंगे बुजुर्ग

साल 2011 में आंध्र प्रदेश में 14 साल से कम उम्र के बच्चों की आबादी 25 फीसदी थी। अनुमान है कि यह आंकड़ा 2036 तक घटकर महज 15 फीसदी रह जाएगा। इसके उलट इसी अवधि में 60 साल या उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 19 फीसदी हो जाएगी। साल 2047 तक यह आंकड़ा 23 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। आंध्र प्रदेश की औसत उम्र इस समय 32.5 साल है, जो देश की औसत उम्र 28 साल से काफी अधिक है। इसका साफ मतलब है कि राज्य तेजी से बूढ़ा हो रहा है। अगर यही रुझान जारी रहा तो 2040 के बाद राज्य में काम करने वाले युवाओं की भारी कमी हो जाएगी।

ज्यादातर महिलाएं चाहती हैं कम बच्चे

भारत में एक तरफ अधिक बच्चे पैदा करने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश महिलाएं कम बच्चे ही चाहती हैं। NFHS-5 के अनुसार, ज्यादातर भारतीय महिलाएं सिर्फ 1 बच्चे की चाहत रखती हैं। इस समय भारत में फर्टिलिटी रेट 1.9 है, जबकि महिलाएं इसे 1.6 चाहती हैं। सर्वे के मुताबिक, जिन दंपतियों के 2 बच्चे हैं, उनमें से 86 प्रतिशत पुरुष और महिलाएं अब तीसरा बच्चा नहीं चाहते। आमतौर पर माना जाता है कि कम पढ़े-लिखे लोग ज्यादा बच्चे चाहते हैं, लेकिन सच्चाई इससे अलग है। जो महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं, उनमें फर्टिलिटी रेट 2.8 है, जबकि वे भी सिर्फ 2.2 बच्चे चाहती हैं। ऐसे में आगे से किसी नेता की 3 या 4 बच्चे पैदा करने की अपील को मजाक में मत लीजिए, यह मुद्दा गंभीर है और सीधे देश व समाज के भविष्य से जुड़ा है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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