चीन
2 घंटे पहले
4
विचारों
भारत के सामने हिमालयी और दक्षिण एशियाई सुरक्षा की नई चुनौतियां
भारत और चीन के बीच सीमा पर चल रहा विवाद सिर्फ जमीन के टुकड़ों या लकीरों तक सीमित नहीं है। यह एशिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच दशकों से जारी वर्चस्व की जंग है। लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी, जो 'चाइना वॉर क्लाउड्स: द ग्रेट चाइनीज चेकमेस' पुस्तक के लेखक भी हैं, ने इस जटिल विषय पर न्यूज़ 18 से विस्तृत बातचीत की। उनका मानना है कि भारत की सुरक्षा चुनौतियों को समझने के लिए केवल वर्तमान घटनाओं पर नजर रखना काफी नहीं है, बल्कि एक सदी पुराने इतिहास को खंगालना जरूरी है। आने वाले समय में एलएसी के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की भूमिका भारत की सामरिक गणनाओं के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
मैकमोहन रेखा और सीमा विवाद का इतिहास
लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी के विश्लेषण के अनुसार, साल 1914 में शिमला में एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के नुमाइंदे शामिल हुए थे। उस दौर में तिब्बत एक स्वतंत्र इकाई की तरह व्यवहार करता था। बातचीत के दौरान मैकमोहन रेखा को पूर्वी सीमा के रूप में निर्धारित किया गया। तत्कालीन नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी आज का अरुणाचल प्रदेश इसी समझौते का हिस्सा था। हालांकि, चीन ने कभी भी इस व्यवस्था को दिल से स्वीकार नहीं किया। यही असहमति आज के सीमा विवादों की जड़ है। साल 1947 में भारत की आजादी के बाद शुरुआती कुछ साल तो अच्छे बीते, लेकिन 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने और 1950 में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भूगोल और सामरिक संतुलन पूरी तरह बदल गया।
पंचशील समझौता और संबंधों में कड़वाहट
वर्ष 1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ, जिसमें भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया। बदले में चीन ने व्यापारिक हितों की रक्षा का आश्वासन दिया। लेकिन, समय के साथ चीजें बिगड़ती गईं। 1959 और 1960 के दौरान चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने पत्र लिखकर मैकमोहन रेखा को मानने से इनकार कर दिया। उसी वक्त दलाई लामा के भारत आने से तनाव और बढ़ गया। 1961 में भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी के तहत सीमा पर चौकियां बनाने से चीन नाराज हो गया। सैन्य जानकारों के मुताबिक, जब दुनिया 1962 के अक्टूबर महीने में क्यूबन मिसाइल संकट के कारण परमाणु युद्ध के मुहाने पर थी, तब चीन ने भारत पर हमला बोल दिया। 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीनी सेना ने आक्रामक रुख अपना लिया था। माओत्से तुंग और नेहरू के बीच हुए पत्र व्यवहार में चीन ने अक्साई चिन पर कब्जे के बदले युद्धविराम का नाटक रचा और अंत में एकतरफा सीजफायर की घोषणा कर दी।
अक्साई चिन का सामरिक महत्व
लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी का साफ मानना है कि अक्साई चिन केवल एक बंजर इलाका नहीं है, बल्कि यह चीन की दीर्घकालिक आर्थिक और सैन्य रणनीति का मुख्य केंद्र है। शिनजियांग से जुड़े होने के कारण यह इलाका चीन के लिए बेहद जरूरी है। इसके माध्यम से ही चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। सोढ़ी के अनुसार, चीन अपनी इस सामरिक बढ़त को कभी भी अपनी मर्जी से नहीं छोड़ेगा।
नेपाल: एक जटिल और महत्वपूर्ण मोर्चे की भूमिका
नेपाल की भूमिका पर बात करते हुए सोढ़ी ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और मानवीय रिश्ते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में चीन ने नेपाल में भारी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के जरिए अपनी पहुंच बढ़ाई है। यदि भविष्य में भारत और चीन के बीच बड़ा युद्ध होता है, तो नेपाल का रुख बहुत महत्वपूर्ण होगा। सोढ़ी के मुताबिक, अगर चीन दबाव बनाता है, तो नेपाल भारत के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल युद्ध के लिए नहीं होने देगा। नेपाली नागरिक दिल से भारत के साथ हैं और वे भारत के प्रति शत्रुता नहीं रख सकते। लेकिन एक बड़ा खतरा यह है कि नेपाल चीन को लॉजिस्टिक्स यानी रसद और सैन्य साजो-सामान के परिवहन की अनुमति दे सकता है। यह भारत के लिए एक गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है।
चीन की आक्रामक सैन्य तैयारी और थ्री फ्रंट वॉर
चीन वर्तमान में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई सैन्य शक्ति है। सोढ़ी ने चेतावनी दी कि आने वाले वक्त में ताइवान संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। चीन सिर्फ पारंपरिक हथियारों पर ही नहीं, बल्कि एआई, साइबर वॉरफेयर और अंतरिक्ष आधारित तकनीकों में भी भारी निवेश कर रहा है। भारत के लिए 'थ्री फ्रंट वॉर' की अवधारणा अब कोई काल्पनिक डर नहीं रह गई है। चीन और पाकिस्तान के अलावा, 5 अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश की बदली हुई राजनीतिक स्थिति ने भारत के लिए नई चुनौतियां पेश की हैं। भारत को अब अपनी सुरक्षा रणनीति को और अधिक व्यापक बनाना होगा।
आधुनिक युद्ध के छह डोमेन
भविष्य के युद्धों का स्वरूप बदल चुका है। सोढ़ी ने छह प्रमुख डोमेन गिनाए हैं: जमीन, समुद्र, आकाश, साइबर स्पेस, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम और अंतरिक्ष। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी युद्ध शारीरिक हमले से पहले डिजिटल नेटवर्क, उपग्रह प्रणाली और संचार माध्यमों को तबाह करने से शुरू होगा। इसलिए, भारत को डिजिटल सुरक्षा में भी चौकन्ना रहना होगा।
अर्थव्यवस्था है सैन्य शक्ति की रीढ़
लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी ने चाणक्य का हवाला देते हुए याद दिलाया कि एक देश की सैन्य ताकत उसकी आर्थिक मजबूती पर टिकी होती है। भारत को अपने घरेलू उत्पादन, प्रौद्योगिकी और पर्यटन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर भारतीय नागरिक का सामूहिक कर्तव्य है।
भूटान और बांग्लादेश: एक नजर
भूटान के बारे में सोढ़ी का मानना है कि वह भारत का सबसे भरोसेमंद और करीबी मित्र बना रहेगा। भूटानी समाज में भारत की साख बहुत मजबूत है। वहीं, बांग्लादेश के मसले पर उन्होंने कहा कि शेख हसीना के जाने के बाद संबंधों में जो बदलाव आए हैं, वे चिंताजनक जरूर हैं, लेकिन उम्मीद है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच पारंपरिक सहयोग फिर से पटरी पर आएगा।
निष्कर्ष
लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी का सार यह है कि भारत को चीन की बढ़ती आक्रामकता के खिलाफ हर मोर्चे पर तैयार रहना होगा। चाहे एलएसी हो या पड़ोसी देशों के साथ बदलते समीकरण, भारत की सतर्कता ही उसकी सुरक्षा की गारंटी है। आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक मजबूती ही इस बड़े भू-राजनीतिक खेल में भारत को सुरक्षित रख सकती है।
Comments
0 comment