मिरांडा हाउस का स्वदेशी सेंसर: अब हाइड्रोजन रिसाव का तुरंत चलेगा पता, टलेंगे बड़े हादसे दिल्ली एक महीने पहले 42
दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज की शोध टीम ने पूरी तरह भारत में बना एक खास हाइड्रोजन सेंसर तैयार किया है, जो गैस रिसाव का तुरंत पता लगाकर बजर के जरिए लोगों को सतर्क कर देता है।

आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन गैस को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में अगर कहीं यह गैस लीक हो जाए तो बड़ा हादसा हो सकता है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज के शिक्षकों और शोध दल ने एक विशेष हाइड्रोजन सेंसर विकसित किया है। यह उपकरण हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तत्काल पता लगाकर लोगों को सचेत कर देता है।

कॉलेज के भौतिकी विभाग की शिक्षिका मोनिका ने बताया कि इस शोध पर पूरी टीम ने मिलकर काम किया। इस दल में अंजलि, हिंदू कॉलेज की रीमा और आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज के अर्जित चौधरी सहित कई अन्य सहयोगी भी शामिल रहे।

दो अलग-अलग तरह के सेंसर किए गए तैयार

शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन गैस को मापने के लिए दो प्रकार के सेंसर विकसित किए हैं। पहला सेंसर क्वांटिटेटिव है, जो यह बताता है कि उसके आसपास हाइड्रोजन गैस की कितनी मात्रा मौजूद है। इसकी मदद से गैस की मात्रा ppm (पार्ट्स पर मिलियन) में मापी जा सकती है।

दूसरा सेंसर खासतौर पर सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया है। जैसे ही आसपास हाइड्रोजन गैस की मात्रा सामान्य स्तर से ऊपर पहुंचती है, यह सेंसर तुरंत बजर यानी आवाज के जरिए चेतावनी देता है, जिससे किसी बड़े हादसे को रोका जा सकता है।

बाजार के सेंसर से कैसे है अलग

प्रोफेसर मोनिका तोमर के मुताबिक, बाजार में मिलने वाले अधिकतर सेंसर विदेशों, खासकर चीन से आयात किए जाते हैं, जबकि मिरांडा हाउस का यह सेंसर पूरी तरह भारत में ही तैयार किया गया है। खास बात यह है कि कॉलेज की शोध प्रयोगशाला में थिन फिल्म टेक्नोलॉजी की मदद से इस उपकरण को शुरू से अंत तक बनाया गया है। सेंसर की फैब्रिकेशन से लेकर पैकेजिंग तक का पूरा काम शोधकर्ताओं ने स्वयं किया है।

4 से 5 साल की मेहनत के बाद मिली कामयाबी

शोध दल पिछले 15 साल से सेंसर तकनीक पर काम कर रहा है। खासतौर पर इस हाइड्रोजन सेंसर को विकसित करने में करीब 4 से 5 साल का समय लगा। टीम का मानना है कि आगे चलकर हाइड्रोजन ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने की संभावना है, इसलिए गैस रिसाव से होने वाले हादसों को रोकने के लिए पहले से ही सुरक्षा इंतजाम तैयार करना जरूरी था।

कैसे काम करता है यह सेंसर

यह सेंसर सामान्य कंडक्टोमेट्रिक सिद्धांत पर आधारित है। जब हाइड्रोजन गैस सेंसर के नजदीक पहुंचती है, तो सेमी-कंडक्टिंग थिन फिल्म की रेजिस्टेंस बदल जाती है। इसके साथ ही इलेक्ट्रिकल पैरामीटर्स में भी परिवर्तन आता है, जिसे वैज्ञानिक मॉनिटर करते हैं। इन्हीं बदलावों के आधार पर सेंसर गैस की मौजूदगी और उसकी मात्रा का पता लगा लेता है।

यह स्वदेशी तकनीक न सिर्फ ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देगी, बल्कि भविष्य में हाइड्रोजन आधारित वाहनों और उद्योगों की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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