अमरूद की खेती: जुलाई से अक्टूबर तक रहेगा फल मक्खी का खतरा, उद्यान विभाग ने दी खास सलाह हरियाणा 2 महीने पहले 76
मानसून के दौरान अमरूद की फसल को कीटों से बचाने के लिए अंबाला के उद्यान विभाग ने किसानों को फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी है, ताकि फल मक्खी के प्रकोप को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके।

बरसात का मौसम शुरू होते ही अमरूद की खेती करने वाले किसानों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। वैसे तो मानसून का यह समय अमरूद के फलों के बेहतर विकास के लिए सबसे उपयुक्त और जरूरी माना जाता है, लेकिन यही समय फसल के लिए सबसे अधिक संवेदनशील और नुकसानदेह भी साबित हो सकता है। इस मौसम में पनपने वाले कीट अमरूद की पूरी फसल को बर्बाद करने की क्षमता रखते हैं।

जुलाई से अक्टूबर के बीच रहता है सबसे बड़ा खतरा

अमरूद उत्पादकों के लिए साल के कुछ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण होते हैं। विशेष रूप से जुलाई से अक्टूबर के दौरान खेतों में फल मक्खी का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए अंबाला के उद्यान विभाग ने किसानों के लिए एक जरूरी सलाह जारी की है। विभाग का कहना है कि किसानों को अपनी फसल को बचाने के लिए शुरुआती स्तर पर ही प्रबंधन की दिशा में काम करना चाहिए ताकि नुकसान से बचा जा सके।

फेरोमोन ट्रैप से कीटों पर लगेगा लगाम

उद्यान विभाग के अनुसार, इस मौसम में फसलों की सुरक्षा के लिए फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल सबसे बेहतरीन और सुरक्षित तरीका है। इस ट्रैप की मदद से नुकसानदेह कीटों को बहुत ही शुरुआती स्तर पर नियंत्रित किया जा सकता है। इससे न केवल कीटों की संख्या पर काबू पाया जा सकता है, बल्कि कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से भी बचा जा सकता है।

फलों को अंदर ही अंदर बर्बाद कर देती है मक्खी

यह फल मक्खी अमरूद की फसल को बहुत ही चालाकी से नुकसान पहुंचाती है, जिसे समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है। इसके संक्रमण का चक्र इस प्रकार काम करता है:

  • सबसे पहले मादा फल मक्खी अमरूद के फलों के छिलके के ठीक नीचे अपने अंडे दे देती है।
  • कुछ ही समय में इन अंडों से छोटे-छोटे लार्वा बाहर निकल आते हैं।
  • ये लार्वा अमरूद के फल के स्वादिष्ट गूदे को अंदर ही अंदर खाना शुरू कर देते हैं।
  • इसके परिणामस्वरूप, फल अंदर से पूरी तरह सड़ जाता है और खाने लायक नहीं बचता।
अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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