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एक घंटा पहले
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धान की फसल पर खैरा रोग का संकट
इस समय धान की खेती में कई प्रकार के कीटों और रोगों के फैलने की आशंका बनी रहती है, जो सीधे तौर पर किसानों की चिंता का विषय बन जाते हैं। इनमें से सबसे प्रमुख खैरा रोग है, जो धान के पौधों को बुरी तरह प्रभावित करता है। यह रोग मुख्य रूप से मिट्टी में जिंक यानी जस्ता तत्व की कमी के कारण पैदा होता है। यदि किसान समय रहते इस रोग की पहचान कर इसका उचित उपचार न करें, तो पौधों का विकास पूरी तरह से थम सकता है, जिसका सीधा असर अंतिम पैदावार की मात्रा पर पड़ता है।
खैरा रोग के प्रमुख लक्षण
दीनदयाल शोध संस्थान कृषि विज्ञान केंद्र गोपाल ग्राम के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर हरपाल सिंह के अनुसार, जब धान के खेत में खैरा रोग का हमला होता है, तो प्रभावित पौधे स्वस्थ पौधों के मुकाबले काफी छोटे और कमजोर नजर आने लगते हैं। इस रोग का सबसे पहला संकेत पत्तियों पर दिखाई देता है। पौधों की जो निचली पत्तियां होती हैं, उन पर हल्के पीले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे अपना रंग बदलकर भूरे या कत्थई रंग के हो जाते हैं। समय बीतने के साथ ये धब्बे गहरे होते जाते हैं और पूरा पौधा रुग्ण दिखने लगता है। खेत में नजर डालने पर कई स्थानों पर आपको पौधे असामान रूप से छोटे और कमजोर दिखाई देंगे। जब यह समस्या गंभीर हो जाती है, तो पत्तियों के अलावा पौधों की जड़ें भी अपना रंग बदलकर भूरी हो जाती हैं, जो फसल को पूरी तरह सुखाने का कारण बनती हैं।
अत्यधिक यूरिया के प्रयोग से बचें
डॉक्टर हरपाल सिंह ने किसानों को सचेत करते हुए कहा कि खैरा रोग का सीधा संबंध जिंक की कमी से है, इसलिए किसानों को किसी भी उर्वरक का अनावश्यक उपयोग नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से यूरिया का बहुत अधिक प्रयोग करना फसल के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। यूरिया की अधिकता से फसल में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे खैरा रोग और अधिक तेजी से फैलता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मिट्टी की जांच कराएं और जरूरत से ज्यादा खाद डालने से बचें। जिंक की कमी को पूरा करने का सबसे बेहतर तरीका जिंक सल्फेट का सटीक छिड़काव करना है।
छिड़काव की सही विधि और मात्रा
खैरा रोग को नियंत्रित करने के लिए जिंक सल्फेट का प्रयोग वैज्ञानिक तरीके से करना बहुत महत्वपूर्ण है। डॉक्टर हरपाल सिंह के अनुसार, एक एकड़ धान की फसल को उपचारित करने के लिए आपको डेढ़ किलो जिंक सल्फेट (33 प्रतिशत) और 2 किलो यूरिया की आवश्यकता होगी। इन दोनों को करीब 150 लीटर पानी में अच्छी तरह से घोल लें और फिर समान रूप से पूरी फसल पर छिड़काव करें। यह मिश्रण जिंक की कमी को दूर करने में बेहद कारगर साबित होता है और पौधों की रुकी हुई वृद्धि को फिर से शुरू करने में मदद करता है।
सावधानी और निगरानी का महत्व
यदि पहले छिड़काव के बाद भी आपको लगे कि खैरा रोग के लक्षण पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं है। कृषि वैज्ञानिक के परामर्शानुसार आप 8 से 10 दिन के अंतराल पर दोबारा उसी अनुपात में छिड़काव कर सकते हैं। किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि वे नियमित रूप से अपने धान के खेतों का निरीक्षण करते रहें। यदि पत्तियों पर पीले या कत्थई धब्बे दिखाई दें या पौधों की बढ़वार असामान्य रूप से धीमी हो जाए, तो उसे कतई नजरअंदाज न करें। याद रखें, किसी भी उर्वरक या रासायनिक मिश्रण का इस्तेमाल करने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना हमेशा बेहतर होता है, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके और उत्पादन को सुरक्षित रखा जा सके।
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